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जानें क्या बात है आज कल, दर्द अपना छिपाने लगा---ग़ज़ल

212 212 212 212 212 212

जानें क्या बात है आज कल, दर्द अपना छिपाने लगा
हाल उसका पता कीजिए, वो बहुत मुस्कुराने लगा

हम उसे बस यूँ ही चारागर, झूठे ही तो नहीं लिख दिए
एक बेजान से बुत में भी, वो जो धड़कन चलाने लगा

उसको पागल नहीं जो कहें, तो भला नाम क्या और दें
एक निर्जन नगर में कोई, स्वप्न के घर बसाने लगा

शुक्रिया आपका शुक्रिया है ये तोहफा बहुत कीमती
देखिए तो विरह का असर शेर मैं गुनगुनाने लगा

उम्र भर की ख़लिश के सिवा कुछ भी नफ़रत से मिलना नहीं
मन से कूड़ा हटा दीजिए, सबको पंकज सिखाने लगा

मौलिक-अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 20, 2018 at 2:27pm

आदरणीय श्याम नारायण सर, सादर आभार

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 20, 2018 at 1:53pm

आ. पंकज जी,
अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई 
अर्कान (२१२X 6 ) जैसे प्रतीत हो रहे हैं..
अंतिम दोनों शेरों में शुतरगुर्बा की सूरत बन रही है..
देखिएगा 
सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 20, 2018 at 11:45am

2122 122 12 2122 122 122  aआदरणीय पंकज जी लास्ट में १२२ की जगह १२ होगा 

इस शानदार रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीका करें सदर 

Comment by Shyam Narain Verma on April 20, 2018 at 11:25am
बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें ।

कृपया ध्यान दे...

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