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लोकशाही क़माल है साहिब
लोक में ही बवाल है साहिब

काम इनके कभी नहीं रुकते
कौन इनका दलाल है साहिब

फिर से मिलने लगे हैं झुक झुक के
खेल करने का साल है साहिब

पूछने पर हमेशा कहते हैं
नेक सा ही ख़्याल है साहिब

अनगिनत हैं सवाल आंखों में
दिल में थोड़ा मलाल है साहिब

- -नंद कुमार सनमुखानी

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 29, 2018 at 9:41am

आ. नन्द कुमार जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 25, 2018 at 12:38pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है आ. नन्द कुमार जी 
बधाई ..
तीसरे शेर में ऊला और सानी में रब्त कम लग रहा है .. झुकने और खेल करने में कोई सम्बन्ध नहीं मिल पा रहा है ..
अंतिम शेर अच्छा बन पडा है..
बधाई 

Comment by Nand Kumar Sanmukhani on April 25, 2018 at 10:43am
जनाब Tasdiq Ahmed Khan साहब,
मशकूर हूं कि आपने ग़ज़ल पर अपनी राय देकर मेरी हौसला अफ़ज़ाई की है।
मेहरबानी आपकी...
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 24, 2018 at 9:42pm

जनाब नन्द सन मुखानी साहिब ,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें।

Comment by Nand Kumar Sanmukhani on April 24, 2018 at 5:23pm
आली जनाब Samar Kabeer साहब,
ग़ज़ल कहने के इल्म से अभी मैं पूरी तरह वाक़िफ़ नहीं हूं। अभी तो इस राह पर मैने चलना शुरू ही किया है। इस लिए ग़ज़ल को ख़ूबसूरत कैसे बनाया जाता है, इसके लिए कौन-कौन से तरीक़े इख़्तियार किये जाते हैं आदि जैसी बातों से लगभग पूरी तरह नावाक़िफ़ हूं।
मेरा यह समूह ज्वॉइन करने का मक़सद भी यही है कि आप जैसे आलिमों के सामने जब अपनी कोशिश रखूंगा तब उसमें रह जाने वाली ग़ल्तियों/कमियों की निशानदेही होगी और उन्हें ठीक करने के मशविरे भी मिलेंगे, जिससे मैं ज़रूर कुछ सीख पाऊंगा ।
Comment by Nand Kumar Sanmukhani on April 24, 2018 at 5:03pm
जनाब Samar Kabeer साहब, आदाब अर्ज़ है।
आपको मेरी छोटी सी कोशिश पसंद आई, यह मेरे लिए इंतहाई ख़ुशी की बात है। तहेदिल से आपका शुक्रगुज़ार हूं।
Comment by Samar kabeer on April 24, 2018 at 3:29pm

जनाब नंद कुमार साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

पूरी ग़ज़ल में सारा बोझ क़वाफ़ी पर है, जबकि ग़ज़ल की ख़ूबी इसे कहते हैं कि क़वाफ़ी पर बोझ न हो ।

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