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ग़ज़ल नूर की- पड़ गयी जब से आपकी आदत

पड़ गयी जब से आपकी आदत,

फिर लगी कब मुझे नई आदत. 
.
ज़ाया कर दी गयीं कई क़समें
ज्यूँ की त्यूं ही मगर रही आदत.
.
मुझ को तन्हा जो छोड़ जाती है
शाम की है बहुत बुरी आदत.
.
पैरहन और कितने बदलेगी? 
रूह को जिस्म की पड़ी आदत.   
.
चन्द साथी जो बेवफ़ा न हुए,  
अश्क, ग़म, याद, बेबसी, आदत.
.
ज़िन्दगी यूँ न तू लिपट मुझ से
पड़ न जाए तुझे मेरी आदत.
.
आदतन याद जब तेरी आई
रात भर आँखों से बही आदत.
.
ये ज़माना नहीं भलाई का
छोडिये “नूर जी” भली आदत.
.
निलेश 'नूर'
मौलिक / अप्रकाशित  

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 10, 2018 at 9:13am

धन्यवाद आ. गुरप्रीत जी,,
आप के मंच पर लौटने का बेसब्री से इंतज़ार था.. 
पुन: सक्रीय  होने के लिए आभार 

Comment by Gurpreet Singh jammu on July 5, 2018 at 12:16pm

वाह वाह नीलेश सर जी , बहुत ही शानदार , जानदार ग़ज़ल। एक एक शेर सवा सेर। यूँ ही नहीं हम आप के फैन हुए

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 7, 2018 at 8:52pm

शुक्रिया आ. लक्ष्मण धामी जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2018 at 3:36pm

आ. भाई नीलेश जी, उत्तम गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2018 at 4:08pm

धन्यवाद आ. समर सर,
मतले से मैं स्वयं 100% संतुष्ट नहीं हूँ ... कुछ और भी सोचता हूँ 
सादर 

Comment by Samar kabeer on May 5, 2018 at 11:37am

जनाब निलेश 'नूर' साहिब आदाब, वाह बहुत ख़ूब, बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है, शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2018 at 7:19am

शुक्रिया आ. नादिर खान साहब,
मैं   भी कई अकालों को देख चुका हूँ.... ईश्वर करे कि आप पर जल्दी ही सरस्वती मेहरबान हों..
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2018 at 7:06am

शुक्रिया आ. दिनेश भाई 
आप   की दाद से हौसला बढ़ता है 
स्नेह बनाए रखिये 
आभार 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2018 at 7:05am

शुक्रिया आ. डॉ आशुतोष जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2018 at 7:05am

शुक्रिया आ. हरिओम श्रीवास्तव जी 

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