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नंगापन (लघुकथा)

स्कूल की छत और कुछ दरख़्तों पर कुछ बंदर अपनी शैली में आनंद ले रहे थे। कक्षा में छात्रों ने उनके 'उत्पात' देखने हेतु आगे पढ़ने से मना कर दिया। दरअसल मॉरल साइंस (नैतिक शिक्षा) के शिक्षक इत्तेफ़ाकन गांधी जी के 'तीन बंदरों' की प्रतीकात्मकता की व्याख्या करते हुए 'सादा जीवन उच्च विचार' के बारे में उन्हें समझा रहे थे!


"ये मज़बूर और परेशान बंदर हैं! किसी तलाश में राह भटक गये हैं!" अपनी बत्तीसी निपोरते एक बंदर की ओर इशारा करते हुए शिक्षक ने कहा।


"नहीं, सर! ये हमारी तरह पिकनिक पर नई जगह मज़े करने आये हैं!" एक छात्र ने मज़े लेते हुए कहा।


"ये जंगल वाले अनुसंधानकर्ता या वैज्ञानिक हैं! कुछ रिसर्च कर रहे हैं घमंडी इंसानों पर!" एक होनहार छात्र बोल पड़ा।


"ख़ुद शरीर से नंगे हैं और हमें कपड़ों में देख कर बत्तीसी निपोर रहे हैं!" बरामदे से ही एक साथी शिक्षक ने  मसखरी करते हुए उस शिक्षक से कहा।


"ये कहो न‌ कि वे वस्त्रधारी बुद्धिजीवियों के स्वार्थी व्यक्तित्व और चारित्रिक नंगेपन पर अपनी बत्तीसी निपोर रहे हैं!" उस शिक्षक ने कक्षा से बाहर निकल कर सूखे से बगीचे और दरख़्तों की ओर देख कर साथी शिक्षक से धीरे से कहा।


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 28, 2019 at 8:32pm

मेरी इस रचना पर समय देकर अपनी राय व सुझाव देने और हौसला अफ़ज़ाई हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया राजेश कुमारी साहिबा और आदरणीया कल्पना भट्ट साहिबा।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 22, 2018 at 6:37pm

बंदरों के माध्यम से आज के दोगले चरित्र के इंसानों पर अच्छा  प्रहार किया है आद० उस्मानी जी बहुत बहुत बधाई .

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 20, 2018 at 7:10pm

शीर्षक पर विचार करियेगा आदरणीय शहजाद जी | कुछेक शब्दों को भी देख लें | सादर|

कृपया ध्यान दे...

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