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अदेह रूप ...

सर्वविदित है
देह का शून्यता में
विलीन होना
निश्चित है
मगर
अदेह चेतना
सृष्टि में व्याप्त
चैतन्य कणों से
निर्मित
आदि अंत से मुक्त
अनंत
अभिश्रुति की
अभिव्यंजना है
मुझे तुमसे मिलने के लिए
उन अदृश्य कणों से निर्मित
धागों की अदेह को
अपने चेतन में
अवतरित करना होगा
मैं
मेरी देह सी
अतृप्त नहीं रह सकती
मैं
तुमसे
अवश्य मिलूंगी

अपने

अदेह रूप में

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 549

Comment

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Comment by Sushil Sarna on June 27, 2018 at 6:56pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on June 27, 2018 at 6:56pm

आदरणीय समर कबीर साहिब , आदाब। .. प्रस्तुति पर आपकी ऊर्जावान प्रशंसा का दिल से शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on June 27, 2018 at 6:56pm

आदरणीय महेन्द्र कुमार जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से शुक्रिया।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 26, 2018 at 8:45pm

आ. भाई सुशील जी, अच्छी रचना हुयी है , हार्दिक बधायी।

Comment by Samar kabeer on June 26, 2018 at 12:01pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा और प्रभावी कविता हुई है,इस प्रस्तुती पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Mahendra Kumar on June 26, 2018 at 10:45am

उम्दा कविता है आदरणीय सुशील सरना जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर। 

Comment by Sushil Sarna on June 25, 2018 at 2:27pm

आदरणीया नीलम उपाध्याय जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on June 25, 2018 at 2:27pm

आदरणीय तेजवीर सिंह जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Neelam Upadhyaya on June 25, 2018 at 2:23pm

अच्छी रचना के लिए बधाई स्वीकार करें आदरणीय सुशिल सरना जी। 

Comment by TEJ VEER SINGH on June 25, 2018 at 1:02pm

हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी। लाज़वाब प्रस्तुति।

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