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लुट गयी कैसे रियासत सोचिये ।
हर तरफ़ होती फ़ज़ीहत सोचिये ।।

कुछ यकीं कर चुन लिया था आपको ।
क्यों हुई इतनी अदावत सोचिये ।।

नोट बंदी पर बहुत हल्ला रहा ।
अब कमीशन में तिज़ारत सोचिये ।।

उम्र भर पढ़कर पकौड़ा बेचना ।
दे गए कैसी नसीहत सोचिये ।।

गैर मज़हब को मिटा दें मुल्क से ।
आपकी बढ़ती हिमाक़त सोचिये ।

दाम पर बिकने लगी है मीडिया ।
आ गयी है सच पे आफत सोचिये ।।

आज गंगा फिर यहां रोती मिली ।
आप भी अपनी लियाक़त सोचिये ।।

जातिवादी हो गयी है सोच जब ।
वोट की गिरती सियासत सोचिये ।।

खा रहे दर दर की ठोकर नौजवां ।
बन गयी दुश्मन हुकूमत सोचिये ।।

नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Neelam Upadhyaya on July 23, 2018 at 2:20pm

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी,  बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है।  प्रस्तुति के हार्दिक बधाई।  

Comment by Naveen Mani Tripathi on July 23, 2018 at 1:19pm

आ0 लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर साहब तहेदिल से शुक्रियः और आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on July 23, 2018 at 1:18pm

आ0 तेजवीर सिंह साहब तहे दिल से शुक्रिया ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on July 23, 2018 at 1:17pm

आ0 कबीर सर सादर नमन के साथ आभार   । अत्यंत सूक्ष्म दृष्टि को भी नमन । एक बार पुनः सप्रेम आभार सर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 22, 2018 at 3:21pm

आ. नवीन भाई, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on July 22, 2018 at 11:48am

जनाब नवीन जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

4थे शैर में 'पकौड़ा' को " पकौड़े" कर लें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on July 21, 2018 at 12:03pm

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी। बहुत शानदार गज़ल।

गैर मज़हब को मिटा दें मुल्क से ।
आपकी बढ़ती हिमाक़त सोचिये ।

दाम पर बिकने लगी है मीडिया ।
आ गयी है सच पे आफत सोचिये ।।

Comment by Naveen Mani Tripathi on July 20, 2018 at 2:10pm

आ0 श्याम नारायण वर्मा साहब तहे दिल से शुक्रिया

Comment by Shyam Narain Verma on July 20, 2018 at 12:33pm
बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई हार्दिक बधाई आपको ।हर शेर लाजबाब , सादर

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