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जब सँभलना.....(गजल)

2122   2122  212

जब सँभलना आदमी को आ रहा
घुट्टियों का खेल खेला जा रहा।1

पाँव भारी हो गए हैं शब्द के
अर्थ क्या से क्या निकाला जा रहा।2

पोथियाँ जज़्बात से घायल हुईं
जो नहीं समझा वही समझा रहा।3

क्या कुलाँचे भर सकेगा अब शशक
घुन मुआफ़िक पाँव कोई खा रहा।4

थम गई थीं आँधियाँ दुर्द्वंद्व की
कौन जहरीली हवा भड़का रहा?5

चैन से नीरो बजाता बाँसुरी
धुन वही हर शख्स फिर-फिर गा रहा।6

कोयलों की बस्तियाँ अब मौन हैं
राग देता काक, गर्दभ गा रहा।7
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on August 7, 2018 at 8:59am

आभारी हूँ आदरणीय,पर मैं 'मनन'हूँ,;अन्य कुछ नहीं।

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 6, 2018 at 10:46pm

भाई मन्नान कुमार सिंह जी अच्छी ग़ज़ल का प्रयास हुआ है ।

बंशिया के स्थान पर बासुरी कर लिया अच्छा लगा

Comment by Manan Kumar singh on August 6, 2018 at 10:14pm

शुक्रिया जनाब तसदीक जी।

Comment by Manan Kumar singh on August 6, 2018 at 10:13pm

आपका आभार आदरणीया नीलम जी।

Comment by Manan Kumar singh on August 6, 2018 at 10:13pm

शुक्रिया जनाब समर साहिब।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 6, 2018 at 9:50pm

जनाब मनन कुमार साहिब , अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं l 

Comment by Neelam Upadhyaya on August 6, 2018 at 4:48pm

आदरणीय मनन कुमार सिंह जी, अच्छी रचना की प्रस्तुति ।  बधाई स्वीकार करें। 

Comment by Samar kabeer on August 6, 2018 at 2:27pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

खामखा घुटनों चलाया जा रहा' 

इस मिसरे में सहीह शब्द है "ख़्वाहमख़्वाह" ।

ये ग़ज़ल दो बार पोस्ट हो गई है,एक हटा दें ।

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