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बीते लम्हों को चलो .....संतोष

अरकान:-

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फेलुन

बीते लम्हों को चलो फिर से पुकारा जाए

वक़्त इक साथ सनम मिलके गुज़ारा जाए

तोड़कर आज ग़लत फ़हमी की दीवारों को

दोस्तो अपने अल्लुक़ को सँवारा जाए

हम तो चल पड़ते हैं बस नाम तुम्हारा लेकर

जिस तरफ़ लेके ये क़िस्मत का सितारा जाए

बाल--पर छीन के आज़ाद कर तू इसको

क़ैद से छूट के पंछी ये मारा जाए

ऐसे हालात में 'संतोष' बहुत मुमकिन है

भूल इक रोज़ समन्दर को किनारा जाए

#संतोष_खिरवड़कर

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 980

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Comment by santosh khirwadkar on October 3, 2018 at 9:41am

बहुत धन्यवाद आ.गुप्ता साहब

Comment by santosh khirwadkar on October 3, 2018 at 9:40am

बहुत शुक्रिया आ.अजय जी 

Comment by santosh khirwadkar on October 3, 2018 at 9:39am

बहुत धन्यवाद आ. बृजेश जी 

Comment by रामबली गुप्ता on October 1, 2018 at 11:03pm

आदरणीय भाई संतोष जी बढियाँ ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें । सादर

Comment by Ajay Tiwari on October 1, 2018 at 7:13pm

आदरणीय संतोष जी, खूबसूरत अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 29, 2018 at 7:13pm

बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय...

Comment by santosh khirwadkar on September 29, 2018 at 11:32am

बहुत शुक्रिया आदरणीय सुशील जी !!!

Comment by Sushil Sarna on September 27, 2018 at 7:09pm

आदरणीय संतोष जी बहुत सुंदर ग़ज़ल बनी है .... हार्दिक बधाई।

Comment by santosh khirwadkar on September 26, 2018 at 8:11pm

प्रणाम आ. समर साहब,बहुत शुक्रिया!!

Comment by santosh khirwadkar on September 26, 2018 at 8:10pm

बहुत शुक्रिया आ  डॉ. सिंह साहब

कृपया ध्यान दे...

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