For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

2122 2122 2122 212
था कभी कितना नरम वह! हर कदर आखर हुआ
जब हवाओं ने छुआ तब पात वह जर्जर हुआ।1

सूख जाती है सियाही आजकल जल्दी यहाँ
ख्वाहिशों के फ़लसफों पे आदमी निर्झर हुआ।2

मिट्टियों की कौन करता है यहाँ पड़ताल भी
हर शज़र गमला सजा आकाश पर निर्भर हुआ।3

जो उड़ाता था वहाँ बेपर घटाओं को कभी
देखते ही देखते वह आजकल बेपर हुआ।4

वक्त की मदहोशियाँ क्या-क्या करा देतीं यहाँ
गर्द के बस ढ़ेर जैसा एक दिन अकबर हुआ।5
"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 83

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Mahendra Kumar on October 26, 2018 at 11:59am

बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है आदरणीय मनन जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।

Comment by Manan Kumar singh on October 25, 2018 at 4:20am

बहुत बहुत आभार आदरणीय लक्ष्मण भाई।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 25, 2018 at 2:07am

आ. भाई मनन जी, सुंदर गजल हुयी है हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

Comment by Manan Kumar singh on October 24, 2018 at 4:20pm

जनाब समर जी,शुक्रिया व नमन।आपकी सहमति से गजल मानपूर्ण हुई।

Comment by Samar kabeer on October 24, 2018 at 3:52pm

जनाब मनन जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल है, बधाई लें ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Naveen Mani Tripathi commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ0 कबीर सर सादर नमन और आभार । उसे है खास ज़रूरत .......भाव कुछ इस तरह लिया है मैंने  बात सलाम…"
23 minutes ago
दिगंबर नासवा posted a blog post

गज़ल - दिगंबर नासवा

मखमली से फूल नाज़ुक पत्तियों को रख दियाशाम होते ही चोबारे पर दियों को रख दिया लौट के आया तो टूटी…See More
2 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani posted a blog post

कुछ हाइकु (23 जनवरी तिथि पर)

कुछ हाइकु :1-तेजस्वी नेताख़ून दो, आज़ादी लोसदी-आह्वान2-नेताजी बोसतेईस जनवरीक्रांति उद्भव3-सच्चाई,…See More
2 hours ago
Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल मनोज अहसास
"बहुत बहुत आभार आदरणीय समर कबीर साहब निश्चित ही ग़ज़ल थोड़ा जल्दबाज़ी में पोस्ट हो गई आपके होने से थोड़ी…"
2 hours ago
Profile IconNitish Kumar Soni and Prashant Saahil Mishra joined Open Books Online
3 hours ago
Samar kabeer commented on rajesh kumari's blog post एक रदीफ़ पर दो ग़ज़लें "छत पर " (गज़ल राज )
"बहना राजेश कुमारी जी आदाब,दोनों ग़ज़लें अच्छी  हुई हैं,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ…"
12 hours ago
Samar kabeer commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल मनोज अहसास
"जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन लगता है जल्द बाज़ी में पोस्ट की है,बधाई स्वीकार…"
12 hours ago
Samar kabeer commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post झूठ फैलाते हैं अक़्सर जो तक़ारीर के साथ (१५)
"आप दोनों की महब्बत के लिए शुक्रगुज़ार हूँ"
12 hours ago
Samar kabeer commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'उसे है ख़ास…"
12 hours ago
Samar kabeer commented on Sushil Sarna's blog post तीन क्षणिकाएं :
"जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी क्षणिकाएँ हुई हैं,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
13 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

गद्दार बन गये जो ढब आदर किया गया - गजल

२२१/२१२१/ २२२/१२१२ पाषाण पूजने को जब अन्दर किया गया हर एक देवता को तब पत्थर किया गया।१। उनके…See More
13 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post 'गठरी, छतरियां और वह' (लघुकथा)
"आदाब। बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब इस हौसला अफ़ज़ाई हेतु।"
15 hours ago

© 2019   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service