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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ६६

२१२२ २१२२ २१२२

है वो मेरा दोस्त, मेरा नुकताचीं भी
शर्म खाए उससे कोई ख़ुर्दबीं भी //१

काविशे सुहबत में आके मैंने जाना
हाँ में उसकी तो छुपा था इक नहीं भी //२

जब उफ़ुक़ पे सुब्ह लाली खिल रही थी
थी हया से सुर्ख थोड़ी ये ज़मीं भी //३

दूर क्यों जाना है ज़्यादा जुस्तजू में
पालती है जबकि दुश्मन आस्तीं भी //४

हाय वो अहदे जवानी के गये दिन
चर्ख सी तेरी चमकती थी ज़बीं भी //५

छीन कर मेरा सुकूं वो पूछता था
क्यों सुकूं मिलता नहीं तुझ को कहीं भी //६

क्या तुझे दूँ मैं, तू मेरे दर खड़ा है
लुट चुकी है मेरी दुनिया और दीं भी //७

हाय उसको पाने की मेरी तमन्ना
वो जवाँ है और सूरत से हसीं भी //८

हर घड़ी कुहराम सा दिल में मचा है
चाहे कितना हो लूँ मैं खिलवत गुजीं भी //९

मुझपे है अहसां फ़रामोशी की ला'नत
जबकि मैं तो कर चुका था आफ्रीं भी //१०

कुछ तो कीजे मेरे कौले लब की इज़्ज़त
आप मुझको टोक देते हैं कहीं भी //११

तोड़ लूँ मैं राज़ कैसे उससे रिश्ता
वो है दिखता सख्त, पर है नाजनीं भी //१२

~ राज़ नवादवी

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

नुकताचीं- आलोचना करने वाले; ख़ुर्दबीं- माइक्रोस्कोप; काविशे सुहबत- साहचर्य की टोह; चर्ख- आस्मां; खिलवत गुजीं- एकांतप्रिय; आफ्रीं- धन्यवाद; कौले लब- बोले गये शब्द;

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Comment by राज़ नवादवी on November 10, 2018 at 9:51am

आदरणीय बृजेश कुमार ब्रज साहब, आदाब. ग़ज़ल में शिरकत और सुखन नवाज़ी का तहे दिले से शुक्रिया. सादर. 

Comment by राज़ नवादवी on November 10, 2018 at 9:51am

आदरणीय अजय तिवारी साहब, आदाब. ग़ज़ल में शिरकत और सुखन नवाज़ी का तहे दिले से शुक्रिया. सादर. 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 9, 2018 at 9:49am

बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय बधाई....

Comment by Ajay Tiwari on November 8, 2018 at 8:27pm

आदरणीय राज़ साहब, खूबसूरत शेर हुए हैं. हार्दिक बधाई. 

Comment by राज़ नवादवी on November 7, 2018 at 10:52am

आदरणीय लक्ष्मण धामी साहब, आपका ह्रदय से आभार. सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 7, 2018 at 10:41am

आ. भाई राज नवादवी जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by राज़ नवादवी on November 7, 2018 at 10:09am

आदरणीय समर कबीर साहब, आदाब. ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफज़ाई का तहेदिल से शुक्रिया. सादर 

Comment by राज़ नवादवी on November 7, 2018 at 10:08am

आदरणीय रवि शुक्ला जी, आदाब. ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफज़ाई का दिल से शुक्रिया. सादर 

Comment by Samar kabeer on November 6, 2018 at 11:29am

जनाब राज़ नवादवी साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by Ravi Shukla on November 6, 2018 at 1:14am

आदरणीय राज नवादवी जी अच्छी गजल कही आापने  दिली मुबारक बाद पेश है 

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