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अपना तो फर्ज एक है तदबीर कर गुजर - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर" ( गजल )

221   2121   1221   212 

तुमको खबर है खूब खतावार कौन है
दो सोच कर सजाएँ गुनहगार कौन है।१।


यारो सिवा वो बात के करता ही कुछ नहीं
हाकिम से इसके बाद भी बे-ज़ार कौन है।२।


हम तो रहे जहीन कि जिस्मों पे मर मिटे
पहली नज़र का बोल तेरा प्यार कौन है।३।


सबसे बड़ा सबूत है मुंसिफ का फैसला
खाके कसम वफा की वफादार कौन है।४।


अपना तो फर्ज एक है तदबीर कर गुजर
तय तो खुदा  करेगा  कि हकदार कौन है।५।


शैलाब  लोकतंत्र  का  बेबस  किये हुए
नावों के  बीच  ढूँढ  तू  पतवार कौन है।६।


दुहरे हुए  हैं  लोग मगर बोझ  से नहीं
कहते हैं भूख बाँट  के  बेकार कौन है।७।


हर इक लगा है लूट में सेवक बना हुआ
जनता की रहनुमाई को सरकार कौन है।८।

**
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 27, 2018 at 9:00am

आ. भाई तेजवीर जी, गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by TEJ VEER SINGH on November 26, 2018 at 8:32pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"जी।बेहतरीन गज़ल।

हर इक लगा है लूट में सेवक बना हुआ
जनता की रहनुमाई को सरकार कौन है।८।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 26, 2018 at 3:50pm

आ. भाई राज नवादवी जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 26, 2018 at 3:50pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति, स्नेह व मार्गदर्शन के लिए आभार ।

Comment by राज़ नवादवी on November 25, 2018 at 8:49pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी साहब, ग़ज़ल की इस पेशकश पे दाद के साथ मुबारकबाद. सादर 

Comment by Samar kabeer on November 25, 2018 at 5:40pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

5वें शैर के ऊला में 'अपना' की जगह "तेरा" शब्द उचित होगा ।

छटे शैर के ऊला में 'शैलाब' को "सैलाब" कर लें ।

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