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हुस्न तेरी आशिकी से कौन रखता दूरियाँ - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर" ( गजल )

२१२२/ २१२२/ २१२२/२१२

आप कहते पंछियों के , 'हमने पर कतरे नहीं'
आँधियों के सामने फिर क्यों भला ठहरे नहीं।१।


जो भी देखा उस पे उँगली झट उठा देता है तू
क्यों कहा करता जमाने ख्वाब पर पहरे नहीं।२।


एक जुगनू ही बहुत है वक्त की इस धुंध में
साथ देने  चाँद  सूरज  गर  यहाँ उतरे नहीं।३।


आईना वो बनके  चल  तू  पत्थरों के शहर में
जिन्दगी की शक्ल जिसमें टूटकर बिखरे नहीं।४।


हुस्न तेरी आशिकी  से  कौन रखता दूरियाँ
कौन हैं जो तेरी खातिर रात दिन सँवरे नहीं।५।


जो गली हम सोच बैठे थे कभी चौपाल सी
बाद तेरे उस गली से आज तक गुजरे नहीं।६।


क्या सताता दूसरा गम हमको दुनियाँ में भला
इक सनम तेरे ही गम से आज तक उबरे नहीं।७।


वो मुसाफिर ही कहाये जिन्दगी भर नाम से
जो नदी की धार जैसे  फिर कभी ठहरे नहीं।८।


मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

Views: 679

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 21, 2018 at 11:56am

आ. भाई अजय जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 21, 2018 at 11:55am

आ. भाई तेजवीर जी, गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 20, 2018 at 4:34pm

आ. भाई राजनवादवी जी, सादर आभार।

Comment by Ajay Tiwari on November 18, 2018 at 6:00pm

आदरणीय लक्ष्मण जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

Comment by TEJ VEER SINGH on November 18, 2018 at 12:33pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"जी। बहुत सुंदर गज़ल।

आईना वो बनके  चल  तू  पत्थरों के शहर में
जिन्दगी की शक्ल जिसमें टूटकर बिखरे नहीं।४।

Comment by राज़ नवादवी on November 18, 2018 at 10:31am

जनाब लक्ष्मण धामी साहिब आदाब,सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे बधाई स्वीकार करें. सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 17, 2018 at 6:54pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । स्नेहाशीष व मार्गदर्शन के लिए आभार ।

Comment by Samar kabeer on November 17, 2018 at 11:49am

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

क्या सताता दूसरा गम हमको दुनियाँ में भला'

इस मिसरे में 'दुनियाँ' को "दुनिया" कर लें ।

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