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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७५

2122 1122 1212 22/ 112

उसका बदला हुआ तर्ज़े करम सताता था
यार बेज़ार था कुछ यूँ कि कम सताता था //१

होके कुछ यूँ वो ब मिज़गाने नम सताता था
कब मैं समझा कि वो अबरू-ए-ख़म सताता था //२ 

दूर रहने पे तेरी क़ुरबतों की याद आई
पास रहने पे जुदाई का ग़म सताता था //३ 

जिनको इफ़रात थी रिज़्को ग़िज़ा की जीने में
ऐसे लोगों को भी कर्बे शिकम सताता था //४ 

पैकरे लफ़्ज़ के जल्वों में मुंकशिफ़ होकर
मेरे अहसास को हुब्बे कलम सताता था //५ 

बेवफ़ा की मैं समझता था सादा पुरकारी
और, क्यों हुस्न का फ़ैज़े निअम सताता था //६ 

ता'न उसकी यूँ सताती थी मेरे सीने को
ज्यों मेरी जेब को वज़्ने दिरम सताता था //७ 

मर गए तो हमें हाले अदम सताता है
साँस थी तो गमे बूदे किदम सताता था //८ 

अब तो तू है नहीं पे तेरे पास रह के भी
कब नहीं राज़ को तेरा अलम सताता था //९

~ राज़ नवादवी 

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

तर्ज़े करम- कृपा करने का ढंग; बेज़ार- विमुख; ब मिज़्गाने नम- भीगी बरौनियों के साथ; तिरछी भौहें (शेर में- तिरछी भौहों वाला); गिज़ा- भोजन, खाद्य पदार्थ; रिज्क- भोजन, जीविका, रोज़ी; कर्बे शिकम- अंतड़ियों का दर्द; पैकरे लफ़्ज़ के जल्वों में मुंकशिफ़- शब्दों के शरीर की छटा में अभिव्यक्त; हुब्बे कलम- कलम का प्रेम; सादा पुरकारी- दिखने में भला, मगर सच में धूर्त होने का भाव, छलिया पान;  फ़ैज़े निअम- नेमतों से प्राप्त होने वाले लाभ; ता'न- कटाक्ष, व्यंग; वज़्ने दिरम- सिक्कों का बोझ; हाले अदम- परलोक की परिस्थिति; गमे बूदे किदम- प्राचीन अस्तित्व का दुःख; 

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Comment by राज़ नवादवी on December 3, 2018 at 7:28pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी साहब, आदाब. ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफज़ाई का दिल से शुक्रिया. सादर. 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 3, 2018 at 11:43am

आ. भाई राजनवादवी जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by राज़ नवादवी on December 1, 2018 at 7:37pm

आदरणीय राहुल डांगी साहब, आदाब. ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफज़ाई का दिल से शुक्रिया. सादर. 

Comment by राज़ नवादवी on December 1, 2018 at 7:37pm

आदरणीय शैलेश चंद्राकर साहब, आदाब. ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफज़ाई का दिल से शुक्रिया. सादर. 

Comment by राज़ नवादवी on December 1, 2018 at 7:37pm

आदरणीय समर कबीर साहब, आदाब. ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफज़ाई का दिल से शुक्रिया. सादर. 

Comment by Rahul Dangi Panchal on December 1, 2018 at 4:03pm

अच्छी ग़ज़ल

Comment by Shlesh Chandrakar on December 1, 2018 at 3:53pm

बहुत बढिया ग़ज़ल है राज़ नवादवी जी, बहुत बधाई।

Comment by Samar kabeer on December 1, 2018 at 3:31pm

जनाब राज़ नवादवी साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

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