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एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए

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वेदना के पल कुँवारे ले चलो
कुछ तो जीने के सहारे ले चलो

दिल बहुत मायूस है परदेस में
बस हमें अब घर हमारे ले चलो

झील सी आंखों में हैं खामोशियाँ
थोड़े से सपने उधारे ले चलो

मैकदे में बंटती है अब भी शिफा
मैकदे में ज़ख्म सारे ले चलो

दुनिया मे महफूज कोई भी नहीं
साथ कितने भी सहारे ले चलो

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by मनोज अहसास on January 24, 2019 at 9:47am

सभी सम्मानीय ,आदरणीय गुणी जनों का हार्दिक आभार

सादर

Comment by अजय गुप्ता 'अजेय on December 10, 2018 at 7:45pm

भाई मनोज जी, सबसे पहले तो अच्छी ग़ज़ल और अलग अंदाज़ अशार के लिए बधाई. अब आपकी ग़ज़ल पर आते है.

///वेदना के पल कुँवारे ले चलो
कुछ तो जीने के सहारे ले चलो

--मतला पढने में अच्छा लग रहा है.

/////दिल बहुत मायूस है परदेस में
बस हमें अब घर हमारे ले चलो

---- घर तो परदेस में भी होता है. देस अब हमको हमारे ले चलो. कुछ इस तरह कीजिये 

////झील सी आंखों में हैं खामोशियाँ
थोड़े से सपने उधारे ले चलो

----झील, ख़ामोशी, सपने. इस शेर में तो रब्त ही नहीं आ रहा.

///मैकदे में बंटती है अब भी शिफा
मैकदे में ज़ख्म सारे ले चलो

---अच्छा शेर है 

////दुनिया मे महफूज कोई भी नहीं
साथ कितने भी सहारे ले चलो

---अच्छा है 

Comment by राज़ नवादवी on December 7, 2018 at 9:15pm

आदरणीय मनोज कुमार जी, आदाब, सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए मुबारकबाद. सादर. 

Comment by Samar kabeer on December 7, 2018 at 8:57pm

जनाब मनोज कुमार अहसास जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

अरकान के बारे में क़मर साहिब बता ही चुके हैं ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 7, 2018 at 3:20pm

आ. भाई मनोज जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by मनोज अहसास on December 7, 2018 at 11:05am

बहुत बहुत शुक्रिया कमर जौनपुरी साहब

दरअसल दूसरी ग़ज़ल पोस्ट करनी थी और ये पोस्ट कर दी बहर पहले ही लिख दी थी

याद दिलाने के लिए हार्दिक आभार

सादर

Comment by क़मर जौनपुरी on December 7, 2018 at 12:57am

अच्छी ग़ज़ल हुई है जनाब मनोज कुमार एहसास जी। मुबारकबाद कबूल करें।

बहर आपने अलग लिख रखी है।

इसकी बहर है

2122 2122 212

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