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क़मर जौनपुरी
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क़मर जौनपुरी posted a blog post

गज़ल

122 122 122 122ग़ज़ल ****है दुनिया में कितनी रवानी न पूछोमहकती है कितनी कहानी न पूछोइसे चाँद के पार जाना था मिलनेकहाँ रह गई ज़िंदगानी न पूछोरहा दर बदर आशिक़ी का मैं मारागई बीत कैसे जवानी न पूछोतेरे इश्क़ में मैंने गोता लगायामिली मुझको क्या क्या निशानी न पूछोमुहब्बत की रस्में निभाते निभातेरहा चश्म में कितना पानी न पूछोकभी ग़म के बादल कभी सर्द आहेंपड़ीं कितनी बातें भुलानी न पूछो-- क़मर जौनपुरीमौलिक अप्रकाशितSee More
14 hours ago
क़मर जौनपुरी posted blog posts
Jan 12
क़मर जौनपुरी commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल : जाम का मौजज़ा दिखा साक़ी
"शुक्रिया मोहतरम समर कबीर साहब इस्लाह के लिए। उन दोनों अशआर को बदल दिया है मैंने। सभी मोहतरम का बहुत बहुत शुक्रिया हौसला आफ़ज़ाई के लिए।"
Jan 12
क़मर जौनपुरी commented on क़मर जौनपुरी's blog post ग़ज़ल: यही सवाल मेरे ज़ेह्न में उभरता है
"बहुत बहुत शुकिया मोहतरम। अक़ीदा लिखना चाहा था यक़ीदा हो गया।"
Jan 12
Samar kabeer commented on क़मर जौनपुरी's blog post ग़ज़ल: यही सवाल मेरे ज़ेह्न में उभरता है
"जनाब क़मर जौनपुरी साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'यकीदा जोड़ के देखो किसी की उल्फ़त से' इस मिसरे में 'यकीदा' का अर्थ क्या है?"
Jan 10
Kalim Yusufpuri commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल : जाम का मौजज़ा दिखा साक़ी
"जनाब जौनपुरी साहिब इस बेहतरीन ग़ज़ल पर दिल से मुबारकबाद पेश करता हूँ"
Jan 9
क़मर जौनपुरी posted a blog post

ग़ज़ल: यही सवाल मेरे ज़ेह्न में उभरता है

1212,1122, 1212, 22/112यही सवाल मेरे ज़ेह्न में उभरता है वो ज़िंदगी के लिए कैसे रोज़ मरता है//१चली है सर्द हवा पूस के महीने में किसान खेत में रातों को आह भरता है//२वो धीरे धीरे मेरे दिल मे यूँ उतर आया कि जैसे चाँद किसी झील में उतरता है//३अक़ीदा जोड़ के देखो किसी की उल्फ़त से जहान सारा नई शक्ल में निखरता है//४नया ज़माना है फ़ैशन का दौर है यारों चमन में भौंर भी तितली सा अब सँवरता है//५सवाल आइना जब भी उछालता मुझ पर ज़मीर रेत की दीवार सा बिखरता है/६-- क़मर जौनपुरीमौलिक अप्रकाशितSee More
Jan 8
Mahendra Kumar commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल : जाम का मौजज़ा दिखा साक़ी
"इल्म के बोझ से दबा हूँ मैंइल्म सारे मेरे भुला साक़ी  बढ़िया ग़ज़ल हुई है आदरणीय क़मर जौनपुरी जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर."
Jan 7
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल: चले भीआओ मेरे यार दिल बुलाता है
"आद0 क़मर जौनपुरी जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल पर शैर दर शैर बधाई देता हूँ। सादर"
Jan 7
Sushil Sarna commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल : जाम का मौजज़ा दिखा साक़ी
"जनाब जौनपुरी साहिब इस बेहतरीन ग़ज़ल पर दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं।"
Jan 6
राज़ नवादवी commented on क़मर जौनपुरी's blog post ग़ज़ल: सुहानी शाम का मंज़र अजीब होता है
"जनाब क़मर जौनपुरी साहिब आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,मुबारकबाद पेश करता हूँ. सादर. "
Jan 6
राज़ नवादवी commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल: चले भीआओ मेरे यार दिल बुलाता है
"जनाब क़मर जौनपुरी जी आदाब,सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ. सादर. "
Jan 6
राज़ नवादवी commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल : जाम का मौजज़ा दिखा साक़ी
"जनाब  क़मर जौनपुरी साहब, सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे मुबारकबाद पेश करता हूँ. सादर. "
Jan 6
Samar kabeer commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल : जाम का मौजज़ा दिखा साक़ी
"जनाब क़मर जौनपुरी साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । ' होश आए न फिर कभी मुझकोजाम का मोजज़ा दिखा साक़ी' किसी शाइर का शैर है:- 'होश आये न फिर कभी मुझको आज इतनी पिलादे मय साक़ी' इसलिए इस शैर को हटाना उचित…"
Jan 5
क़मर जौनपुरी's blog post was featured

ग़ज़ल: सुहानी शाम का मंज़र अजीब होता है

1212 1122 1212 22/112 .सुहानी शाम का मंज़र अजीब होता है भुला दिया था जिसे वो क़रीब होता है//१वो पाक जाम मिटा दे जो प्यास सदियों की किसी किसी के लबों को नसीब होता है//२मिली जहाँ में जिसे भी दुआ ग़रीबों की नहीं वो शख़्स कभी बदनसीब होता है//३वफ़ा से दे न सका जो सिला वफ़ाओं का वही जहान में सबसे ग़रीब होता है//४करे मुआफ़ जो छोटी बड़ी ख़ताओं को वही तो जीस्त में सच्चा हबीब होता है//५क़लम की धार से जो काट दे जहालत को वही समाज का आला अदीब होता है//६बुझा सका न किसी की भी प्यास जो सागर अथाह आब लिए बदनसीब होता…See More
Jan 5
क़मर जौनपुरी posted a blog post

गज़ल : जाम का मौजज़ा दिखा साक़ी

2122 1212 22ग़ज़ल*****जाम आंखों से अब पिला साक़ीहोश मेरे तू अब उड़ा साक़ी//१ज़िन्दगी भर रहा हूँ मैं काफ़िरअपना कलमा तू अब पढ़ा साक़ी//२इल्म के बोझ से परेशां हूँइल्म सारे मेरे भुला साक़ी//३रंग मेरा उतर गया अब तोरंग अपना तू अब चढ़ा साक़ी//४बेख़ुदी ज़ीस्त में समा जाएजाम ऐसा कोई पिला साक़ी//५ख़्वाब आएं तो सिर्फ तेरे होंख़्वाब से ख़्वाब तू मिला साक़ी//६हो गया मैं फ़ना तेरे सदकेवाह क्या है तेरा नशा साक़ी//७-- क़मर जौनपुरीमौलिक अप्रकाशितSee More
Jan 5

Profile Information

Gender
Male
City State
Jhumri Tilaiya
Native Place
Jaunpur
Profession
Hindi Teacher
About me
Myself Hindi teacher since 21 years. Trying to compose kavita and gazal

क़मर जौनपुरी's Blog

गज़ल

122 122 122 122

ग़ज़ल

****

है दुनिया में कितनी रवानी न पूछो

महकती है कितनी कहानी न पूछो

इसे चाँद के पार जाना था मिलने

कहाँ रह गई ज़िंदगानी न पूछो

रहा दर बदर आशिक़ी का मैं मारा

गई बीत कैसे जवानी न पूछो

तेरे इश्क़ में मैंने गोता लगाया

मिली मुझको क्या क्या निशानी न पूछो

मुहब्बत की रस्में निभाते निभाते

रहा चश्म में कितना पानी न पूछो

कभी ग़म के बादल कभी सर्द आहें

पड़ीं कितनी बातें भुलानी न…

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Posted on January 19, 2019 at 4:07pm

ग़ज़ल: यही सवाल मेरे ज़ेह्न में उभरता है

1212,1122, 1212, 22/112

यही सवाल मेरे ज़ेह्न में उभरता है

वो ज़िंदगी के लिए कैसे रोज़ मरता है//१

चली है सर्द हवा पूस के महीने में

किसान खेत में रातों को आह भरता है//२

वो धीरे धीरे मेरे दिल मे यूँ उतर आया

कि जैसे चाँद किसी झील में उतरता है//३

अक़ीदा जोड़ के देखो किसी की उल्फ़त से

जहान सारा नई शक्ल में निखरता है//४

नया ज़माना है फ़ैशन का दौर है यारों

चमन में भौंर भी तितली सा अब सँवरता…

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Posted on January 5, 2019 at 1:00pm — 2 Comments

गज़ल : जाम का मौजज़ा दिखा साक़ी

2122 1212 22

ग़ज़ल

*****

जाम आंखों से अब पिला साक़ी

होश मेरे तू अब उड़ा साक़ी//१

ज़िन्दगी भर रहा हूँ मैं काफ़िर

अपना कलमा तू अब पढ़ा साक़ी//२

इल्म के बोझ से परेशां हूँ

इल्म सारे मेरे भुला साक़ी//३

रंग मेरा उतर गया अब तो

रंग अपना तू अब चढ़ा साक़ी//४

बेख़ुदी ज़ीस्त में समा जाए

जाम ऐसा कोई पिला साक़ी//५

ख़्वाब आएं तो सिर्फ तेरे हों

ख़्वाब से ख़्वाब तू मिला साक़ी//६

हो गया मैं फ़ना…

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Posted on January 4, 2019 at 9:30pm — 6 Comments

गज़ल: चले भीआओ मेरे यार दिल बुलाता है

1212, 1122, 1212,22/112

*****

चले भी आओ मेरे यार दिल बुलाता है

यूँ रूठकर भी भला अपना कोई जाता है//1

सज़ा भी दे दो मुझे अब मेरे गुनाहों की

उदास चेहरा तुम्हारा नहीं सुहाता है//२

उदास तुम जो हुए ज़िंदगी उदास हुई

कोई भी जश्न मुझे अब नहीं हंसाता है//३

तुम्हारे दम से ही हर सुब्ह मेरी ज़िंदा थी

हर एक शाम का मंज़र मुझे रुलाता है//४

नज़र फिराई जो तुमने वो एक लम्हे में

हर एक लम्हा ही ठोकर लगा के जाता…

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Posted on January 3, 2019 at 2:30pm — 3 Comments

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