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1212 1122 1212 22
हर एक शख्स को मतलब है बस ख़ज़ाने से ।
गिला करूँ मैं कहाँ तक यहां ज़माने से ।।

कलेजा अम्नो सुकूँ का निकाल लेंगे वो ।।
उन्हें है वक्त कहाँ बस्तियां जलाने से ।।

न पूछ हमसे अभी जिंदगी के अफसाने ।
कटी है उम्र यहां सिसकियां दबाने से ।।

मैं अपने दर्द को बेशक़ छुपा के रक्खूँगा ।
मिले जो चैन तुझे मेरे मुस्कुराने से ।।

हमारे हक़ पे न हमला करो यहां साहब ।
चलेगा मुल्क़ नहीं इस तरह चलाने से ।।

वो रूठते हैं तो कुछ और आना जाना रख ।
बनेग़ा यार कोई  सिलसिले बनाने से ।।

बड़ें यकीन से कहकर गया है फिर कोई ।
खुदा मिलेंगे तुझे दूरियां मिटाने से ।।

भरम बनाए रखें दोस्ती का दुनिया में ।
ये रिश्ते टूट न जाएं यूँ आजमाने से ।।

उसे पता है हवाओं का रुख किधर है अब ।
बुझेगी आग यहां आग फिर लगाने से ।।

ये आंख कुछ तो बताती है आपकी फ़ितरत ।
छुपा  है  दर्द  कहाँ  आपके  छुपाने से ।।

अजीब दौर है इंशानियत  नहीं दिखती ।
ज़मीर बेच रहे लोग फ़िर बहाने से ।।


        -- नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on December 18, 2018 at 12:44pm

आ0 फूल सिंह साहब हार्दिक आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 18, 2018 at 12:43pm
आ0 दयाराम मैथानी साहब हार्दिक आभार
Comment by Dayaram Methani on December 13, 2018 at 11:06pm

बड़ें यकीन से कहकर गया है फिर कोई ।
खुदा मिलेंगे तुझे दूरियां मिटाने से ।।.........बहुत ही सुंदर भाव भरा शेर।

भरम बनाए रखें दोस्ती का दुनिया में ।
ये रिश्ते टूट न जाएं यूँ आजमाने से ।।..........जीवन की सच्चाई व्यक्त करता शेर।

आदरणीय बहुत अच्छी गज़ल हुई है। बधाई स्वीकार करें।

Comment by PHOOL SINGH on December 13, 2018 at 4:49pm

सूंदर रचना बधाई स्वीकारे"

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