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मत समझना मैं...(गजल)

2122 2122 2122 2

मत समझना मैं पढ़ा अख़बार हूँ कल का

हमसफ़र हूँ,काबिले-आसार हूँ कल का।1

राह सिमटी जा रही है आज की पल-पल

देख लो मुझको जरा आधार हूँ कल का।2

कौड़ियों के मोल बिकता आज तुम्हारा

सच लिए चलता रहा मनुहार हूँ कल का।3

रोशनाई की उमंगों का रहा कायल

लग रहा जैसा भले उजियार हूँ कल का।4

हो गया धुँधला बदन करतूत तेरी है

मौन हूँ मैं आज पारावार हूँ कल का।5

बेच लो अपनी हकीकत हो सके जितना

सच लिए सबका खरा बाजार हूँ कल का।6

गीत अपने तुम सुना लो आज ढुलमुल-से

गर्दिशों से जूझता अशआर हूँ कल का।7 

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on Tuesday
जी नमस्कार आदरणीय समर जी।
Comment by Manan Kumar singh on Tuesday
जी आभार आदरणीय।
Comment by Samar kabeer on Tuesday

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Manan Kumar singh on Tuesday
शकुरजी, शायद आपका मतलब शेर 5 के बदले शेर 6 से है।
Comment by Manan Kumar singh on Tuesday
शुक्रिया आदरणीय शकूर जी!जरा विस्तार से कह देते तो जल्दी ध्यान चला जाता,सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on Tuesday

आ. मनन सिंह सर, अच्छी ग़ज़ल है, सादर बधाई। शेर क्र. 3 और 5 में तक़ाबुल ज रदीफ़ की सूरत बन रही है ज़रा देख लीजिएगा।

कृपया ध्यान दे...

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