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ग़ज़ल 

मिलन की रात का लम्हा छुपा है

नज़र में बस तेरा चेहरा छुपा है

 दुआ लेकर निकलना रोज़ घर से 

यहाँ हर मोड़ पर ख़तरा छुपा है

लबों पर प्यास लेकर फिरने वाले

तेरे अंदर भी इक दरिया छुपा है

महकती है हमेशा ज़ीस्त यूँ भी

कि सांसों में तेरा गजरा छुपा है

सनम मत जा अभी ख़्वाबों से मेरे

अभी तो चाँद भी आधा छुपा है

'अहद' लिखना न होगा बंद मेरा

अभी दिल में बहुत लावा छुपा है !

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by AMIT on April 9, 2019 at 9:41am
हार्दिक आभार आदरणीय !
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 9, 2019 at 9:08am

बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है आपने..बधाई आदरणीय

Comment by AMIT on April 7, 2019 at 6:11pm
बहुत बहुत शुक्रिया सर !
Comment by Samar kabeer on April 7, 2019 at 6:02pm

जनाब अमित जी आदाब,उम्द: ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by AMIT on April 5, 2019 at 11:01pm
ग़ज़ल पसंद करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय !
Comment by Sushil Sarna on April 5, 2019 at 2:57pm

महकती है हमेशा ज़ीस्त यूँ भी

कि सांसों में तेरा गजरा छुपा है

आदरणीय अमित जी बहुत खूबसूरत अशआर बन पड़े हैं। दिल से बधाई।

Comment by AMIT on April 4, 2019 at 7:25am
अरे वाह्ह्ह मनोज भाई आप भी हैं यहाँ ,बहुत बहुत शुक्रिया भाई !

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