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डाटा रिकवरी! (लघुकथा) :

कई दिनों से टल रहा काम निबटा कर, थके-हारे मिर्ज़ा मासाब अपने अज़ीज़ दोस्त पंडित जी के साथ अपने घर वापस पहुंचे। अपनी नाराज़ बेगम साहिबा को कुछ इस अंदाज़ में देखने लगे कि बेगम का ग़ुस्सा फ़ुर्र से उड़ गया!


"क्या बात है पंडित जी! आज ये हमें इस तरह क्यूँ घूर रहे हैं!" कुछ शरमा कर मुस्कराते हुए बेगम ने अपने पल्लू की आड़ लेकर कहा।


"डाटा रिकवरी करवा कर आये हैं मिर्ज़ा जी के लेपटॉप की!" पंडित जी ने दोस्त का कंधा दबाते हुए कहा।


"अच्छा! वो तो बहुत बढ़िया किया आपने। बहुत परेशां रहते थे एक ड्राइव लॉक करके पासवर्ड वग़ैरह सब भूलकर! लेकिन मुझे क्यूं ऐसे देख रहे हैं ये इतने सालों बाद!" बेगम ने अबकी बार बिना किसी शरम और लिहाज़ के वही सवाल दोहराया।


मिर्ज़ा जी चुप्पी साधे हुए बस मंद-मंद मुस्करा रहे थे। सो पंडित जी ही कुछ यूं बताने लगे सारा माज़रा :


"भाभीजान, हुआ ये कि इनके लेपटॉप की उस लॉक्ड ड्राइव की डाटा रिकवरी कराने जहां मैं इन्हें ले गया, वहां की एक ख़ूबसूरत, जवां और मॉडर्न कर्मचारी के हाथों में मेंहदी और कलाइयों में राजस्थानी सी ढेर सारी चूड़ियां और कड़े देखकर इन्हें आपसे निकाह के पहले के लव-अफ़ेअर और बाद के दिनों की याद ताज़ा हो गई! वहां ये जनाब उसे भी ऐसे ही घूर रहे थे! वो तो मैंने इनका कंधा दबाकर इनका सिर दूसरी कर्मचारी की तरफ़ घुमा दिया, ...वरना!" इतना कहकर पंडित जी ज़ोर से हंसने लगे।


"तो वो क्या नई-नई शादीशुदा थी!"


"नहीं, भाभीजान! वो तो बेहद फ़ैशनेबल कुंवारी लड़की थी। माथे पर बिंदी लगाये, कानों में भारी बालियां पहने छोटे कपड़े पहने हुए थी! इतरा रही थी एकदम रिमिक्स्ड आइटम!" पंडित जी को यूं बोलते देख मिर्ज़ा मासाब उन्हें इशारे से चुप होने को कहते रहे, लेकिन सब बेकार।


बेगम साहिबा तुरंत अपनी ड्रेसिंग टेबल की ओर गईं और अपनी शक्ल और बदन का मुआयना सा करने लगीं। मुरझाया सा झुर्रीदार चेहरा, रूखी-सूखी चमड़ी और बुढ़ापे की दस्तक उनकी आंखों को नम करने लगे।


तभी अंदर जाकर पीछे से मिर्ज़ा साहिब ने उन्हें बाहों में लेकर कहा, "वहां उस लड़की के हाथों, मेंहदी, कलाइयों और चूडियों-कड़ों से तुम्हारी डाटा रिकवरी करने लगा था बेगम! वाकई आज मुझे तुम उन दिनों वाली वैसी ही मेरी मेहबूबा नज़र आ रही हो!"


तभी बैठक-कक्ष से पंडित जी ने खांसते हुए कहा, "अच्छा, अब चलता हूं; दुआओं में याद रखना!"


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 19, 2019 at 11:57am

आदाब। मेरी इस रचना के अवलोकन और प्रोत्साहक टिप्पणी हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीय समर कबीर साहिब, आदरणीय तेजवीर सिंह साहिब, आदरणीय विजय निकोर साहिब और आदरणीय तस्दीक़ अहमद ख़ान साहिब।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 16, 2019 at 6:02pm

जनाब भाई शहज़ाद उस्मानी साहिब आ दाब, अच्छी लघुकथा हुई है मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं l 

Comment by Samar kabeer on April 16, 2019 at 2:45pm

जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 16, 2019 at 11:58am

हार्दिक बधाई आदरणीय शेख उस्मानी साहब जी।बेहतरीन लघुकथा।

Comment by vijay nikore on April 16, 2019 at 11:19am

// "वहां उस लड़की के हाथों, मेंहदी, कलाइयों और चूडियों-कड़ों से तुम्हारी डाटा रिकवरी करने लगा था बेगम! वाकई आज मुझे तुम उन दिनों वाली वैसी ही मेरी मेहबूबा नज़र आ रही हो!"//...

इन पंक्तियों ने  तोआँखों को नम कर दिया।

वाह, सच में बहुत ही ज़ोरदार लघु कथा लिखी है , भाई शेख उस्मानी जी।

कृपया ध्यान दे...

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