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रविवार सवेरे 7:00 बजे।
चाय की पहली चुस्की ली ही थी कि अखबार में छपे एक चित्र ने ध्यान खींच लिया। एक आँख जिसमें खुली पलकों के नीचे पुतली की बजाय सलाखें थी और उन सलाखों को एक हाथ ने थाम रखा था। कितने ही क्षण मैं हाथ में कप लिए उस चित्र को एकटक देखता रहा। इच्छाओं से जुड़े सपनों को कितनी ही बार सलाखों के पीछे बंद कर दिया जाता है।
सवेरे 9:00 बजे।
नाश्ता नहीं खा पाया, वही चित्र आँखों के सामने घूम रहा है। बचपन से नौकर-चाकरों और केअर टेकर के साथ ही रहा। डैडी  को बिजिनेस से फुर्सत नहीं थी तो मॉम को क्लब्स/कीटीज़ से वहीं दादी अपनी पूजा-पाठ में ही लगी रहती। सिर्फ मुझे आज़ादी नहीं थी, कहीं बाहर जाना होता तो ड्राईवर के साथ मेरी केअर टेकर मेरे साथ होती। जब रास्ते में कभी बच्चों को खेलते देखता तो कार की खिड़कियों पर फिसलते हुए मेरे हाथ उस चित्र में सलाखें थामे हुए जैसे ही लगते थे। दस साल का था मैं, जब एक दिन मॉम ने कहा था," बेटा! अपने स्टेट्स का ख्याल रखा करो। चाहो तो क्लब चला करो, वहाँ अपने स्टेट्स के बच्चों से दोस्ती करो।"  लेकिन मेरी आँखों में मिट्टी भरी थी, कभी क्लब नहीं जा पाया।
सवेरे 11:00 बजे।
पिछले चार घंटों में चार बार चाय पी चुका हूँ। डेड्डी की भी याद आ रही है मैं ग्यारह साल का भी नहीं हो पाया, जब उनका स्वर्गवास हो गया था, घर पूरी तरह बदल गया। कुछ ही महीनों के बाद दादी भी इसी गम में चल बसीं। नौकर चाकर तो थे लेकिन घर के नाम पर बचे सिर्फ मॉम और मैं। मॉम ने मुझे भी कुछ ना हो जाये इस डर से सलाखों को और भी मजबूत कर दिया और मेरे मन ने अपने हाथों से उन सलाखों को और भी कस कर थाम लिया।
मध्यान्ह 12:00 बजे।
एक कप ब्लैक कॉफी पी, शायद इससे कुछ संयत हो पाऊँ... लेकिन...। मॉम मुझे प्यार तो बहुत करती थी, लेकिन वे भी कभी क्लब और किटीज़ की सलाखों से आज़ाद नहीं हो पाईं और मैं केअर टेकर जैसी एक रोबोट के चंगुल से निकल नहीं पाया।
अपराह्न 2:00 बजे।
लंच में कुछ खा पाया। मेरा बेटा और बेटी दोनों सवेरे 6:00 बजे से रविवार की तफरीह पर चले गए थे। उनके आने पर ऐसा प्रतीत हुआ जैसे अमीरी की सलाखें तोड़ कर कोई एलओसी लांघ गया और मुझे भूख लग आई।
और यह लिखकर अविनाश ने डायरी बंद कर दी
मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Nita Kasar on May 10, 2019 at 4:15pm

जीवन की आपाधापी में बहुत कुछ  पीछे छूट जाता है वही अतीत आज बन जाता है।बधाई कथा के लिये आद० कल्पना भट्ट जी ।

Comment by Samar kabeer on April 23, 2019 at 3:08pm

बहना कल्पना भट्ट रौनक़ जी आदाब,अच्छी लघुकथा हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 19, 2019 at 11:51am

आदाब। बहुत बढ़िया। हार्दिक बधाई आदरणीया कल्पना भट्ट साहिबा।

मध्याह्न बारह.बजे वाले  चरण में /करती थी/ --- /करता था/; /हो पाई/--/हो पाया/ .. कृपया देख लीजिएगा।

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