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माँ! तुम हो शक्ति स्वरूपा
न पाया तुमसा कोई दूजा
समय से भी तुमने की लड़ाई
हर बार समय को आँख दिखाई
नन्हीं नन्हीं क्यारियों में तुमने
प्यार-मुहब्बत के बीज जो बोये
अपने प्यार से सींचा है तुमने
घर-आँगन महकाया है तुमने
माँ तुमसा और न कोई देखा
हर दुःख को तुमने हँसते हुए फेंका
हर बार जब भी मैं घबरायी
सामने तुम ही तुम नज़र आई
कैसा डर! यह पूछा जब तुमने
नारी शक्ति से परिचय करवाया तुमने
आज जो भी कुछ है मैंने पाया
संग मेरे रहा तुम्हारा ही साया।
तुम बिन जीवन सूना हो जाये
तुमबिन न मुझको और कोई भाये।
रखना अपना हाँथ मेरे सिर पर
रहना संग मेरे, मेरे भीतर
माँ तुम हो मेरी - बस मेरी
तुम भी कहो न मैं हूँ बस तेरी।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 20, 2019 at 12:37pm
वाह आदरणीया सुन्दर रचना...
Comment by नाथ सोनांचली on March 17, 2019 at 5:07pm

आद0 कल्पना भट्ट जी सादर अभिवादन। मातृ शक्ति को बताती बढिया सृजन पर मेरी बधाई स्वीकार कीजिये। सादर

Comment by vijay nikore on March 16, 2019 at 3:22am

कविता अच्छी लगी। बधाई, आ० कल्पना जी

Comment by Neelam Upadhyaya on March 14, 2019 at 10:35am

विषयगत अच्छी प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें आदरणीया कल्पना भट्ट 'रौनक ' जी।

Comment by Samar kabeer on March 12, 2019 at 2:44pm

बहना कल्पना भट्ट रौनक़ जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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