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2122 2122 212

जब लबों पर वह तराना आ गया ।
याद फिर गुजरा ज़माना आ गया ।।

शब के आने की हुई जैसे खबर ।
जुगनुओं को जगमगाना आ गया ।।

मैकदे को शुक्रिया कुछ तो कहो।
अब तुम्हें पीना पिलाना आ गया ।।

वस्ल की इक रात जो मांगी यहां ।
फिर तेरा लहजा पुराना आ गया ।।

छोड़ जाता मैं तेरी महफ़िल मगर ।
बीच मे ये दोस्ताना आ गया ।।

जब भी गुज़रे हैं गली से वो मेरे ।
फिर तो मौसम क़ातिलाना आ गया ।।

आरिजे गुल पर तबस्सुम देख कर ।
तितलियों को भी रिझाना आ गया ।।

उठ रहीं जब से कलम पर उँगलियाँ ।
और चर्चा में फ़साना आ गया ।।

कुछ तेरी सुहबत का शायद है असर ।
ज़िंदगी को मुस्कुराना आ गया ।।

हुस्न जब दाखिल हुआ महफ़िल में तब।
शायरों का आबो दाना आ गया ।

बदला बदला आपका है ये मिज़ाज ।
हाथ में क्या फिर खज़ाना आ गया ।।

डॉ नवीन मणि त्रिपाठी 

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 8, 2019 at 7:37pm

आ. भाई नवीन जी, बेहतरीन गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by TEJ VEER SINGH on May 8, 2019 at 10:48am

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी साहब जी।बेहतरीन गज़ल।

बदला बदला आपका है ये मिज़ाज ।
हाथ में क्या फिर खज़ाना आ गया ।।

Comment by नाथ सोनांचली on May 8, 2019 at 3:55am

आद0 नवीन मनी त्रिपाठी जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने बधाई स्वीकार कीजिये

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