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बिन तेरे रात गुज़र जाए बड़ी मुश्किल है, सलीम 'रज़ा' रीवा

2122 1122 1122 22
बिन तेरे रात गुज़र जाए बड़ी मुश्किल है
और फिर याद भी न आए बड़ी मुश्किल है

खोल कर बैठे हैं छत पर वो हसीं ज़ुल्फ़ों को
ऐसे में धूप निकल आए बड़ी मुश्किल है

मेरे महबूब का हो ज़िक्र अगर महफ़िल में
और फिर आँख न भर आए बड़ी मुश्किल है

वो हसीं वक़्त जो मिल करके गुज़ारा था कभी
फिर वही लौट के आ जाए बड़ी मुश्किल है

वो सदाक़त वो सख़ावत वो मोहब्बत लेकर
फिर कोई आप सा आ जाए बड़ी मुश्किल है

---
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by SALIM RAZA REWA on September 9, 2019 at 10:46pm

बहुत शुक्रिया मोहतरम

Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on August 6, 2019 at 7:15pm

 SALIM RAZA REWA जी,

"वो सदाक़त वो सख़ावत वो मोहब्बत लेकर
फिर कोई आप सा आ जाए बड़ी मुश्किल है"

सुन्दर शेर के साथ अच्छी ग़ज़ल | 

Comment by Samar kabeer on August 4, 2019 at 10:42am

जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

'वो हंसीं वक़्त जो मिल करके गुज़ारा था कभी'

इस मिसरे में 'हंसीं' को "हसीं" कर लें ।

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