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बुलन्दी मेरे जज़्बे की - सलीम 'रज़ा' रीवा

1222 1222 1222 1222

बुलन्दी मेरे जज़्बे की ये देखेगा ज़माना भी
फ़लक के सहन में होगा मेरा इक आशियाना भी

.
अकेले इन बहारों का नहीं लुत्फ़-ओ-करम साहिब
करम फ़रमाँ है मुझ पर कुछ मिजाज़-ए-आशिक़ाना भी

.
जहाँ से कर गए हिजरत मोहब्बत के सभी जुगनू
वहां पे छोड़ देती हैं ये खुशियाँ आना जाना भी
.
बहुत अर्से से देखा ही नहीं है रक़्स चिड़ियों का
कहीं पेड़ों पे भी मिलता नहीं वो आशियाना भी
.
हमारे शेर महकेंगे किसी दिन उसकी रहमत से
हमारे साथ महकेगा अदब का ये घराना  भी 
.
न जाने किन ख़्यालों में नहाकर मुस्कुराती है
'रज़ा' उसको नहीं आता है राज़-ए-दिल छुपाना भी

--------

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by Samar kabeer on July 25, 2019 at 2:47pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,आप ये ग़ज़ल पहले ओबीओ पर पोस्ट कर चुके हैं,और इसके 4थे शैर पर काफ़ी चर्चा भी हो चुकी है,याद करें ।

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