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अपनी ज़ुल्फों को धो रही है शब - सलीम रज़ा रीवा

2122 1212 22

अपनी ज़ुल्फों को धो रही है शब

और ख़ुश्बू निचो रही है शब

oo

मेरे ख़ाबों की ओढ़कर चादर

मेरे बिस्तर पे सो रही है शब

oo

अब अंधेरों से जंग की ख़ातिर

कुछ चराग़ों को बो रही है शब

oo

सुब्ह--नौ के क़रीब आते ही

अपना अस्तित्व खो रही है शब

oo

दिन के सदमों को सह रहा है दिन

रात का बोझ ढो रही है शब

___________________

"मौलिक व अप्रकाशित

बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून

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Comment by Samar kabeer on May 2, 2019 at 11:38am

जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 2, 2019 at 10:56am

जनाब सलीम रज़ा साहिब, गज़ब के एहसास से सजी उम्दा ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं I 

Comment by नाथ सोनांचली on May 1, 2019 at 6:07pm

आद0 सलीम साहब सादर अभिवादन। ग़ज़ल पर आपको दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ

Comment by Sushil Sarna on May 1, 2019 at 3:15pm

अपनी ज़ुल्फों को धो रही है शब

और ख़ुश्बू निचो रही है शब

oo

मेरे ख़ाबों की ओढ़कर चादर

मेरे बिस्तर पे सो रही है शब

आदरणीय सलीम रजा रीवा साहिब , आदाब। ... गज़ब के अहसास पिरोये हैं आपने ग़ज़ल में । आपकी कल्पना और कलम को सलाम। दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं सर।

Comment by राज़ नवादवी on May 1, 2019 at 12:14am

आदरणीय सलीम रज़ा साहब, आदाब. सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे बधाई क़ुबूल करें. सादर. 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 30, 2019 at 2:04pm

आदरणीय सलीम जी को सादर नमस्कार, बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई, बधाई आपको 

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