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जनाबे मीर के लहजे की नाज़ुकी कि तरह - सलीम रज़ा रीवा

1212 1122 1212 22/112

--

जनाबे मीर के लहजे की नाज़ुकी कि तरह 
तुम्हारे लब हैं गुलाबों की पंखुड़ी की तरह 
oo
शगुफ्ता चेहरा ये  ज़ुलफें ये नरगिसी आँखे 
तेरा हसीन तसव्वुर है शायरी की तरह 
oo
अगर ऐ जाने तमन्ना तू छत पे आ जाए 
अंधेरी रात भी चमकेगी चांदनी की तरह
oo
यूँ ही न बज़्म से तारीकियाँ हुईं ग़ायब
कोई न कोई तो आया है रोशनी की तरह
oo
यही ख़ुदा से दुआ मांगता हूँ रातो दिन
कि मै भी जी लूं ज़माने में आदमी तरह

_________________________

बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Samar kabeer on April 23, 2019 at 3:02pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

'जनाबे मीर के लहजे की नाज़ुकी कि तरह'

इस मिसरे में 'कि तरह' को "की तरह" कर लें । 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 19, 2019 at 3:44pm

वाह क्या कहने बेहतरीन ग़ज़ल कही है सलीम साहब..बधाई

Comment by Asif zaidi on April 18, 2019 at 11:36pm

बहुत ख़ूब जनाब सलीम रज़ा साहब मुबारकबाद मोहतरम

Comment by SALIM RAZA REWA on April 18, 2019 at 9:39pm
आमोद जी,
बहुत बहुत शुक्रिया.
Comment by SALIM RAZA REWA on April 18, 2019 at 9:38pm
मोहतरम तस्दीक साहब,
आपकी मोहब्बत के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 18, 2019 at 7:31pm
  • जनाब सलीम रज़ा साहिब आ दाब, बहुत ही उम्दा ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं l 
Comment by amod shrivastav (bindouri) on April 18, 2019 at 11:47am

आ सलीम रजा साहब आदाब
अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारे

कृपया ध्यान दे...

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