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मेरे प्रिय विभु मेरे प्रिय मोरांडी-

(13 अगस्त-2018-इटली का मोरांडी पुल हादसा)

 

अटठावन वर्ष की उम्र भी कोई उम्र होती है

ना तो पूर्ण  रुपेण युवा और ना ही पूरे वृद्ध

तुम्हारा यूँ इस तरह अकस्मात ही चले जाना

पूरे शहर को कर गया है अचम्भित और विक्षिप्त

पसर गई है चारों ओर  निरवता और खौफ

जो गिरने के जिम्मेदार हैं वो घूम रहे हैं बेलौफ

 

साठ बरस पहले तुम थे सुंदर प्यारे शिशु

नाम दिया था मैंने तुमको विभा का विभु

तब तुम थे सबके लिए एक अबूझ पहेली

हम लोहे और सीमेंट के संग करते थेअट्खेली

मैं किसी की दोस्त थी और किसी की सहेली

तेरी ओट में हमने कितनी बरसातें थीं झेली

 

हम दोनों युवा हुए मैं उड गई आकाश में

तुम वहीं धरा पर खडे रहे मेरी याद में

और ढोते रहे असंख्य अंजान लोगों को

इस पार से उस पार अनवरत और लगातार

मैं छुट्टियों में घर आती छत से तुम्हें निहारती

तुम मुझे देखकर मुसकुरा देते विभा के विभु

 

तुम्हें आज क्या हुआ जो नहीं रह सके खडे

बिना चेतावनी के भरभरा कर गिर पडे

तुम्हारे इस विद्रोह से तैतालीस लोग चल बसे

जाने कितने वाहन नदी की गाद में जा धसे

लोग चीख और चिल्ला रहे हैं अपनों के गम में

शायद हम दोनों मिले फिर से अगले जनम में

- प्रदीप देवीशरण भट्ट- मौलिक व अप्राशित

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Comment

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Comment by pratibha pande on August 27, 2019 at 7:05pm

एक ढह गये पुल को याद करती आपकी ये रचना बहुत सुन्दर  और प्रभावशाली है। हार्दिक बधाई आपको।

Comment by Samar kabeer on August 25, 2019 at 12:16pm

जनाब प्रदीप जी आदाब,अच्छी रचना हुई,बधाई स्वीकार करें ।

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