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Pradeep Devisharan Bhatt's Blog (20)

मैं एक स्त्री भी हूँ

"अंतर्रष्ट्रिय  महिला दिवस पर विशेष"

सिर्फ माँ बहन पत्नी बेटी की,

परिभषा में मत उल्झओ

सबसे पहले मैं एक स्त्री हूँ,

मुझे मेरा सम्मन दिलवाओ।।

 

सिर्फ वंश…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on March 8, 2019 at 11:30am — 2 Comments

अपबे वतन में बेघर

अपने वतन में बेघर का दर्द क्या जानो

जिन्होने लूटा है खसूटा उनको पहचानो

मेहनत मज़दूरी की तो जी गये बच्चे

संस्कार मिले थे बुजुर्गो से हमें भी अच्छे

लुट गये लेकिन हथियार उठाया ना कभी

वतन पे जान देने का है इरादा अब भी…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on February 18, 2019 at 6:00pm — 2 Comments

"मरघट के कपोत"

मनुज पशु पक्षी और जंतु,

एक ही सबका जीवन दाता,

धनी हो या फिर निर्धन कोई,

मरघट अंतिम ही सुख् दाता ।

भोर से लेकर सांझ तलक शव,

मरघट में आते रह्ते हैं,

चंद्न लकडी घी पावक मिल,

भस्म उसे करते रहते हैं ।

मूषक पिपिलिका कपोत उपाकर,

व्रीही खाकर जीवीत रहते हैं,

दूषित समझ मनुज जो छोडे,

वो जल पी जीवीत रहते हैं ।

उचित अनुचित तो ये भी जाने,

मनुज के मन को भी पहचाने,

पाप पुण्य का ज्ञान…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on February 4, 2019 at 12:30pm — 4 Comments

"अज़ीम शख़्स की दास्तां"

जब वो कहता है तो वो कहता है 

रोक पाता नहीं उसे कोई , 

उसके आगे ना रंक, राजा है , 

कंठ में कोयल सा उसके वासा है ॥ 

जब भी कहता है सच ही कहता है 

जैसे बच्चा हृदय में रहता है , 

उसके…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on January 4, 2019 at 1:00pm — 8 Comments

"आजकल"

आजकल कोई बुलाता भी नहीं।

आजकल मैं भी कहीं जाता नहीं

आजकल हर ओर है बदली फिज़ा

आजकल गायब है चेहरे से गीज़ा॥

 

आजकल कुछ भी सुहाता ही नहीं।

आजकल मैं गुनगुनाता भी नहीं

आजकल बदले हुए हालात हैं

आजकल मैं मुस्कुराता भी नहीं॥

 

आजकल बेकार है सब कोशिशें।

आजकल हैं लग रही बस बंदिशें

आजकल अपने ही छलते हैं यहाँ

आजकल हैं सब बहुत बस परेशां॥

 

आजकल वादों की ही भरमार है।

आजकल गैरों के सर पे हाथ…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on November 30, 2018 at 4:00pm — 2 Comments

"अहसास"

ज़िंदगी दी है खुदा ने,मुस्कुराने के लिए

भूलना लाज़िम है तुमको,याद आने के लिए

 

बेखयाली मे कदम फ़िर, खींच लाये है मुझे

मैं नहीं आया किसी का, दिल चुराने के लिए

 

यूँ ही मिल जाए कोई फ़िर, क़द्र करता ही…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on November 21, 2018 at 1:00pm — 3 Comments

"हुक्मनामा"

 

हिम्मत है तो मुझसे आकर द्वंद करो।

वरना यूँ अनर्गल प्रलाप को बंद करो॥

 

छोरे छोरी में जो भेद करे ऐसे।  

गाँव की सगरी ऐसी खाप को बंद करो॥…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on October 27, 2018 at 2:00pm — 2 Comments

"मन मार्जियां "

जुल्म की ये इंतेहा भी कब तलक।

ज़िंदगी के इम्तेहा भी कब तलक॥

आज़ या कल बिखर ही जाऊंगा।

वक़्त होगा मेहरबाँ भी कब तलक॥

ऐब ही जब ऐब तुझमें हैं भरे मैं ।

तुझमें ढूँडू ख़ूबियाँ भी कब तलक॥…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on October 23, 2018 at 11:30am — 1 Comment

आस्था "

हर घर में एक राम है रहता।

हर घर में एक रावण भी॥

जैसी जिसकी सोच है रहती।

उसको दिखता वो वैसा ही॥

 

टूट शिला से छोटा टुकड़ा।

लुढ़क रहा मंदिर की ओर॥

कोई देखता उसको पत्थर।

कोई देखता भगवन को॥

 

आस्था और विश्वास जहां हो।

तर्क नहीं देते कुछ काम॥

मानो या न मानो लेकिन।

बनते सबके बिगड़े काम॥

 

धर्म-अधर्म सब अंदर अपने।

पीर पड़े लगे राम को जपने॥

वर्षो से यही रीत चल रही।

इच्छाओं की गति…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on October 22, 2018 at 5:30pm — 1 Comment

"दीवाना "

मुश्किलों में मुस्कुराना सीख लो।

ज़िंदगी से दिल लगाना सीख लो ॥

शौक़ पीने का तुम्हें माना मगर।  

दूसरों को भी पिलाना सीख लो॥

ढूँढने हैं मायने गर जीस्त के।

तो राग तुम कोई पुराना सीख लो॥…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on October 20, 2018 at 5:30pm — 2 Comments

"एक शहर का दु:ख"

ये क्या हो रहा मेरे प्यारे शहर को,

कहीं क़त्ल-ओ-गारत कहीं ख़ून के छीटें,

के घायल हैं चंदर कहीं पे सिकंदर,

के हर ओर फैले हुए अस्थि पंजर,

के तुम ही कहो कैसे देखूँ ये मंजर,

के आँखों के सूखे पड़े हैं समंदर ।।…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on October 12, 2018 at 3:00pm — 3 Comments

-बापू की व्यथा-

आज फिर बापू को हमने याद दिल से कर लिया ।

और सारे साल फिर इनसे किनारा कर लिया ।।

 

फूल चरणों में चढ़ाकर सोचते सब ठीक है ।

रूप बगुले का बशर ने फिर तिबारा कर लिया।।

 

परचम-ए-खादी तिरंगे  में लिपटकर…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on October 2, 2018 at 9:00am — 5 Comments

"स्वाभिमान"

बेवजह खुर्शीद पर, उँगली उठाया मत करो।

ख़ाक हो जाओगे तुम, नज़रें मिलाया मत करो।।

 

चलना है तो साथ चल वरना कदम पीछे हटा।

दोस्ती की राह में  काँटे बिछाया मत करो।।

 

मुश्किलें आती रहेंगी जब तलक जीवन है…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on September 30, 2018 at 6:30pm — 1 Comment

जीवन के इंद्र्धानुषी रंग

माया-काया के चक्कर मे, उलझे जाने कितने लोग।

दूर तमाशा देख रहे हैं, हम जैसे अनजाने लोग॥

ठगनी माया कब ठहरी है,एक जगह तू सोच ज़रा।

बौराए से फिरते रहते, कुछ जाने पहचाने लोग॥

हँसना-रोना, खोना –पाना, जीवन के हैं रंग कई। 

दुख से…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on September 26, 2018 at 1:00pm — 3 Comments

"तारतम्यता"

                                      

तुम या तो बन जाओ किसी के,

या उसको अपना बना के देखो,

जीवन महकेगा फूलों सा,

प्रेम सुधा  तुम पीकर देखो ।।

क्या खोया है क्या पाया…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on September 19, 2018 at 6:00pm — 4 Comments

मुंबई मेरी जान

सबके लिए है कुछ न कुछ, मुंबई मे ज़रूर ।

एक बार सही मुंबई में बस आइए ज़रूर॥

 

निर्विघ्न हो जब हाथ है सर पे विघ्नहर्ता का।

श्रद्धा तू रख ये होंगे सिद्ध एक दिन ज़रूर।।

 

खाली नहीं लौटा है बशर, हाजी-अली…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on September 13, 2018 at 12:00pm — 2 Comments

"तमाशा"

पल में तोला है पल में माशा है

ये ज़िन्दगी है या एक तमाशा है

 

मय को पीकर इधर उधर गिरना

ये मयकशी है या एक तमाशा है

 

दब गए बोल सारे साज़ों में

ये मौसिक़ी है या एक तमाशा है

 

दिख रहे ख़ुश बिना तब्बसुम के 

ये ख़ुशी है या एक तमाशा है

 

इश्क़ को कर रहा रुसवा कबसे     

ये आशिक़ी है या एक तमाशा है

 

दरिया में रह के नीर की चाहत

ये तिश्नगी है या एक तमाशा है

 

तू जल रहा फिर…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on September 1, 2018 at 1:14pm — 1 Comment

जीने की चाह

चाह जीने की अगर, तुझमें पनपती है प्रबल,

रास्ता रोकेगा कैसे, फिर तुम्हारा दावानल ।

चाहे जितनी मुश्किलें, आयें तुम्हारे सामने,

तुम कभी करना नहीं, अपनों नयनों को सज़ल ।

जिंदगी के रास्ते, इतने सरल होते नहीं,

तुझको भी पीना पड़ेगा,अपने हिस्से का गरल ।

तू अगर सच्चा है तो फिर, डर तुझे किस बात का,

मंजिलों की जुस्तज़ू में, हौसले लेकर निकल ।

कर नहीं पायेगी तुझको, कोई भी मुश्किल विकल,

गर इरादे होंगे तेरे, आसमां…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on August 31, 2018 at 5:30pm — 2 Comments

जीवन की धमाचौकड़ी

जीवन की धमाचौकड़ी में वो अस्त-व्यस्त था।

मिलता तो था सभी से मगर ज़्यादा व्यस्त था।।

 

हर चंद कोशिशें थीं  कि दीदार-ए-यार  हो।

पहरा मगर महल में बहुत ज़्यादा सख्त था।।

 

कहने को गर हैं भाई फिर मैदान-ए-जंग में।

गिरता था ज़मीन पे वो फिर किसका रक्त था।।

 

गर सब हैं बेगुनाह तो चल अब तू ही दे बता।

खंज़र मेरे शरीर में वो किसका पेवस्त था।।

 

जिससे भी जुड़ा रिश्ते में वो बंधता चला गया।

बस उसका ही मिजाज थोड़ा ज़्यादा…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on August 24, 2018 at 3:00pm — 1 Comment

मैं अभी भी मुस्कुराता हूँ “



        

राज की बात एक बताता हूँ।

मैं अभी भी मुस्कुराता हूँ

 

मुश्किलें घेरने से डरती हैं।

हँसते-हँसते उन्हें डराता हूँ।।

 

जब भी तन्हाइयों में होता हूँ।

इक नया गीत गुनगुनाता हूँ।।

 

मेरा हौसला ही मेरा संबल है।

रोज़ थोड़ा सा इसे बढ़ता हूँ।।

 

जीवन है खेल सारा शब्दों…

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Added by Pradeep Devisharan Bhatt on July 26, 2018 at 4:30pm — 3 Comments

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