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काश मैं भी उड़ सकती

खुले विस्तृत गगन में

बादलों को चीरते हुए 

और छू सकती आकाश

                                                                   

पर ये संभव ही कहाँ है 

भाग्य के हाथों हूँ मजबूर

यूँ ही रोज़ खिड़की पर बैठना

और तकना है खाली व्योम

                                   

पर ये मन मानता ही नहीं

कल्पनाओं के पंखों पर सवार

उड़ता रहता है सुबहो शाम

इसे आता नहीं दूजा कोई काम

  

                                                                         

 मन है कि मानता ही नहीँ ....

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on December 5, 2019 at 5:28pm

शुक्रिया महेंद्र जी, कभी कभी ऐसी गलतियाँ हो जाती हैं

Comment by Mahendra Kumar on December 4, 2019 at 6:30pm

अच्छी रचना है आदरणीय प्रदीप जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।

Comment by vijay nikore on December 1, 2019 at 1:58am

अच्छी रचना के लिए बधाई, आदरणीय देवीशरण जी।

Comment by नाथ सोनांचली on November 30, 2019 at 8:41pm

आद0 प्रदीप देवीशरण भट्ट जी सादर अभिवादन। बढ़िया प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार कीजिये।

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on November 28, 2019 at 6:21pm

धामी जी शुक्रिया

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on November 28, 2019 at 6:21pm

शुक्रिया समर जी 

Comment by Samar kabeer on November 28, 2019 at 12:05pm

जनाब प्रदीप देवीशरण भट्ट जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 28, 2019 at 6:22am

आ. भाई प्रदीप जी, सादर अभिवादन। सुंदर प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on November 27, 2019 at 6:28pm

सुशील जी आपका स्नेह बना रहे, शुक्रिया

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on November 27, 2019 at 6:27pm

शुक्रिया उषा जी,

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