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अब सिर्फ़ तुम्हारी यादें ही तो हैं

जिन्हें संजोकर रक्खा हुअ है मैंने।

अपनी धुँधली होती हुई स्मृतियों में,

इन गुलाब के फूलों क़ी पंखुड़ियों में॥

 

मैं अभी तक भी कुछ नहीं भूला हूँ,

लैंपपोस्ट क़ी वो मद्दिम रौशनी में।

मेरे कांधे तुम्हारा धीरे से सर रखना,

औऱ फिर घंटो तलक अपलक निहारना॥

 

वो आकाश में बिजली का वो कौंधना,

तुम्हारा घबराकर मुझसे लिपट जाना।

मुझे अहसास कराता था सदियों का,

उन पलों का कुछ देर यूँ ही ठहर जाना॥

 

अब तो सिर्फ़ और सिर्फ यादें शेष हैं,

लैंपपोस्ट भी वही और बेंच भी वही है।

पर तुम नहीं हो, तुम कहीं भी नहीं हो,

अगर कुछ है तो ये अवशोषित* शरीर॥

 

*जिसका नाश किया गया हो

 

 - प्रदीप देवीशरण भट्ट  - हैदराबाद-27.11.2019 मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Mahendra Kumar on December 4, 2019 at 9:37pm

हार्दिक बधाई आदरणीय प्रदीप जी, अच्छी रचना हुई है। 

//वो आकाश में बिजली का वो कौंधना// इस पंक्ति में एक "वो" अतिरिक्त है। सादर।

Comment by Samar kabeer on December 1, 2019 at 11:49am

जनाब प्रदीप जी आदाब,अच्छी प्रस्तुति,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by नाथ सोनांचली on November 30, 2019 at 8:39pm

आद0 प्रदीप जी सादर अभिवादन। इस खूबसूरत प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार कीजिये।सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 28, 2019 at 4:44pm

आ. भाई प्रदीप जी, सादर अभिवादन। सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई।

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