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गहन अँधेरे में

रात-अँधेरे सारी रात

टटोलते कोई एक शब्द

स्वयं में स्माविष्ट कर ले 

जो तुम्हारे आने का उल्लास

चले जाने का विषाद

कभी बूँद-बूँद में लुप्त होती

खिलखिलाती रंग-बिरंगी हँसी

और प्यारी हिचकियाँ तुम्हारी

आँसू ढुलकाती, मेरी ओर ताकती

दीप-माला-सी तुम्हारी आँखें

कि मोहनिद्रा में जैसे

मेरे ओठों पर तुम

अपने शब्दों को खोज रही हो

यह प्रासंगकि नहीं है क्या

कि मैं रात-अँधेरे सारी रात

टटोल रहा हूँ वह एक शब्द

स्माविष्ट हो जिसके आवर्त में

तुम्हारी सारी उपरोक्त सर्ष्टि

पर घायल हताश रात में

अन्धकार की सीमा खोजते

विस्मय हत

हर नई सुबह यही जाना कि

बहुत कम थी सारी रात

तुम्हारे आने के सुख

और मजबूर चले जाने के दुख

को प्रथक करने के लिए

गहन धुँधलापन ओढ़े

आज जब मेरे समय के साँचे में

अवशेष पल फड़फड़ा रहे हैं

लिपट रही है मुझसे 

तुम्हारे हृदय की दुखती हुई धड़कन

तुम्हारी वह कष्टमयी मजबूरी

बिखरते खयालों में बरसती बेचैनी

यह जानो प्रिय कि

तुम्हारे आँसुओं की नमी

अभी मेरी आँखों में बाकी है

             -------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on October 8, 2019 at 1:37pm

इस आत्मीय सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, मित्र सुशील जी।

Comment by vijay nikore on October 8, 2019 at 1:36pm

आत्मीय सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, भाई समर कबीर जी।

Comment by Sushil Sarna on October 8, 2019 at 12:21pm

वाह आदरणीय विजय निकोर जी हमेशा की तरह नायाब भावों के सैलाब को समेटे शानदार प्रस्तुति। दिल से बधाई सर।

Comment by Samar kabeer on October 7, 2019 at 7:47am

प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब,बहुत ख़ूब, वाह, लाजवाब रचना,इस प्रस्तुति पर बधाई सरकार करें ।

Comment by vijay nikore on October 4, 2019 at 4:13pm

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, मित्र श्याम नारायन जी

Comment by Shyam Narain Verma on October 2, 2019 at 6:18pm
आदरणीय विजय जी, प्रणाम, बहुत ही सुंदर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर
Comment by vijay nikore on October 2, 2019 at 12:05pm

इस आत्मीय सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, भाई समर कबीर जी।

Comment by Samar kabeer on September 25, 2019 at 8:04am

प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब,बहुत उम्द: और हमेशा की तरह प्रभावशाली सृजन, इस शानदार प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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