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कितने "अपने"

पहचाने थे यही रास्ते

पेड़ों की छाँह ओढ़े

कुहनी टेक

सरक जाते थे कितने

अच्छे-बुरे तजुर्बे

अचानक

चौंक जाती थी शाम

"मुझको घर जाना है"

तुम्हारे अरुणिम ललाट पर

अकस्मात चिंता की छायाएँ

और फिर ...

और फिर देख 

मेरी आँखों में अपनी आँखों की चमक

तुम्हारा ही मन नहीं करता था 

हाथ छोड़ चले जाने को

कि मानो जाते-जाते रुक जाती थी शाम

एक "और" आज के प्रेम-पत्र पर

सत्य की मुहर लगाने को

सुना है, मेरी तरह

तुम भी सहम-सहम कर

कभी लड़खड़ाती, कुछ बुदबुदाती

अतीत के टुकड़ों में मेल-जोल

जोड़-तोड़ करती

समर्पणशील भोली लहर-सी

खो देती हो खुद को इस नई शाम में

और सन्धया वेला की आरती उतारते

ढूँढती हो हवाओं के बेसब्र आलापों में

अब कुचली हुई उस पुरानी परेशान शाम को

सुनो, रुको-रुको

ज़िन्दगी के मैदानों में 

घनी-घनी काँपती काली छायाओं में

सुनता हूँ मैं मीठे समीर-सी

लौटते हुए पहचाने पैरों की 

आत्मा की आहट

शायद ... 

            -------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on October 4, 2019 at 4:28pm

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, भाई समर कबीर जी।

Comment by vijay nikore on October 4, 2019 at 4:27pm

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, मित्र लक्ष्मण धामी जी

Comment by Samar kabeer on October 4, 2019 at 11:10am

प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब,बहुत ख़ूब, वाह, बहुत अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 2, 2019 at 2:20pm

आ. भाई विजय निकोर जी, सादर अभिवादन। साथ ही इस भावविभोर करती रचना के लिए हार्दिक बधाई ।

Comment by vijay nikore on October 2, 2019 at 12:07pm

 सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, मित्र बृजेश जी।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 1, 2019 at 12:08pm

अनुपम भाव रचना आदरणीय विजय जी 

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