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कुण्डलिया (लोक पर्व "छठ पूजा")

अर्चन करने सूर्य का, चले व्रती सब घाट
छठ माँ के वरदान से, दमके खूब ललाट
दमके खूब ललाट, प्रकृति से ऊर्जा मिलती
हो निर्जल उपवास, मगर मुख आभा खिलती
शाम सुबह देें अर्घ्य, करें यश बल का अर्जन

चार दिनों का पर्व, करें सब मन से अर्चन।।

पूजा दीनानाथ की, डाला छठ के नाम
अस्त-उदय जब सूर्य हों, करते सभी प्रणाम
करते सभी प्रणाम, पहुँच कर नदी किनारे
भरकर दउरा सूप, अर्घ्य दें हर्षित सारे
प्रकृति प्रेम का पर्व, नहीं है जग में दूजा
अन्न कूट फल फूल, चढ़ाकर होती पूजा।।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by नाथ सोनांचली on November 7, 2019 at 10:49pm

आद0 भाई सतविंदर जी सादर अभिवादन। आपकी प्रशंशा मनोहारी है। हृदय तल से आभार आपका।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 5, 2019 at 7:20am

आदरणीय सुरेन्द्रनाथ जी सादर नमन, सुन्दर कुण्डलिया 

Comment by नाथ सोनांचली on November 4, 2019 at 8:33pm

आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम,, रचना पोस्ट करने के बाद से ही आपकी प्रतिक्रिया का मुझे सदैव ििएंटीजार रहता है। आपकी बारीक नजर रचना के सुधारने में अहम रोल अदा करता है। रचना पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए कोटिश आभार व्यक्त करता हूँ। सादर

Comment by नाथ सोनांचली on November 4, 2019 at 8:28pm
आद0 लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी सादर अभिवादन,, रचना पर गरिमामयी उपस्थिति और खूबसूरत प्रतिक्रिया के लिए कोटिश आभार व्यक्त करता हूँ।सादर
Comment by Samar kabeer on November 4, 2019 at 3:02pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,अच्छा कयडलिया छन्द लिखा आपने,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 4, 2019 at 9:49am

आ. भाई सुरेंद्र जी, छठ पर्व पर सुंदर दोहे हुए हैं । हार्दिक बधाई।

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