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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- 55

ग़ज़ल- १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

 

लिखा है गर जो किस्मत में तो फिर बदनाम ही होलें

न बाइज़्ज़त तो बेइज़्ज़त तुम्हारे नाम ही होलें

 

न कुछ करने से अच्छा है तू वादा तोड़ ही डाले 

न हों कामिल वफ़ा में तो दिले नाकाम ही होलें

 

न हो महफ़िल तुम्हारी तो किसी महफ़िल में रोलें हम

चलो हम आज कूचा ए दिले बदनाम ही होलें

 

मुझे रिज़वान रख लें वो बहिश्ते ख़ूब रूई का

घड़ी भर को कभी मेरे वो हमआराम ही होलें

 

जो हों जन्नतनशीं तो ग़ालिबन फिर साथ में तेरे 

कभी हम सैर पे जाएँ कभी हम्माम ही होलें

 

ग़ज़ल है गुफ़्तगू उनसे तवक़्क़ो में कभी शायद

वो वाबस्ता ज़रीआ ए ख़त-ओ-पैग़ाम ही हो लें

 

ख़ुदा मुस्तैद कर मुझको तेरे ग़ैबी निज़ामों में

दिले बेगार से पूरे तेरे कुछ काम ही होलें

 

चलो तुम ‘राज़’ को दे दो सभी झगड़े सुलह करने

कि इसके हाथ नेकी ओ जज़ा अंजाम ही होलें

~ राज़ नवादवी 

रिज़वान- स्वर्ग का द्वारपाल; बहिश्त- स्वर्ग; तवक़्क़ो- अपेक्षा, उम्मीद;  बावस्ता- सम्बद्ध; ग़ैबी- पारलौकिक; निजाम- व्यवस्था; जज़ा- प्रत्युपकार

"मौलिक एवं अप्रकाशित" 

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Comment by Samar kabeer on October 6, 2017 at 3:24pm
जनाब राज़ नवादवी साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
'वो बावस्ता ब ज़रिया ए ख़त-ओ-पैग़ाम ही हो लें'
इस मिसरे में एक तो 'बावस्ता'ग़लत शब्द है,सही शब्द है"वाबस्ता",दूसरी बात 'बा ज़रिया ए'ग़लत शब्द है सही शब्द है "बा ज़रीआ"इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-
'वो वाबस्ता ज़रीआ ए ख़त-ओ-पैग़ाम ही हो लें'
Comment by SALIM RAZA REWA on October 6, 2017 at 1:28pm
बहोत खूब मुबारक़बाद.
Comment by राज़ नवादवी on October 5, 2017 at 9:40pm

आदरणीय अफ्रोज़ सह्र साहब, आपका हृदय से आभार. हां, पहला रुक्न १२२२ की जगह १२२२२ गलती से टाइप हो गया है. धन्यवाद नज़र में लाने के लिए, सादर 

Comment by Afroz 'sahr' on October 5, 2017 at 9:36pm
आदरणीय राज़ नवादवी साहिब अच्छी ग़ज़ल के लिए आपको बहुत बहुत बधाई।अर्कान दुरुस्त करलें सादर,,

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