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हिंदी गजल: बहरे हजज मुसद्दस (6) सालिम

1222 1222 1222
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गजब ये रंग देखा है जमाने का।
सहारा है सभी को इक बहाने का।
*****
नजर के तीर से कर चाक दिल मेरा,
कहेगें हाल तो कह दो निशाने का।
*****
रही आदत खिलौना प्यार को समझा,
किया है खेल रोने औ रुलाने का।
*****
हमारा दर्द ही हमको सिखाया है,
बुरे हालात में, हँसने हँसाने का।
*****
मरा है क्यों उसीपे ऐ दिवाना दिल,
हिदायत दे गया जो छोड़ जाने का।
*****
तड़पते देख हैं-हैरान उनको हम,
जिन्हें उस्ताद माना था सताने का।
*****
लिखा मैंने वही उल्फत जुड़ी तुमसे
बुरा ही हश्र हुआ मेरे फ़साने का।
*****

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 4, 2015 at 5:21am
आदरणीय समर कबीर जी एवं आदरणीय निलेश सेवगांवकर जी सादर नमन और आभार देय सराहना और सुझाव हेतू।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 3, 2015 at 6:59pm

बहुत खूब ग़ज़ल हुई है ..बधाई. गिरिराज जी की बात पर गौर कीजिएगा.
दूसरे और तीसरे शेर में ज़ुज्ब ए रदिफैन नामक दोष है जो दोनों मिसरों के रदीफ़ के एक सामान स्वर पर समाप्त होने को कहते हैं
सादर    

Comment by Samar kabeer on April 3, 2015 at 2:51pm
जनाब सुनील प्रसाद(शाहाबादी) जी,आदाब,सुन्दर हिन्दी ग़ज़ल हेतु बधाई स्वीकार करें |
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 3, 2015 at 12:14pm
हार्दिक आभार आदरणीय श्यामनारायण वर्मा जी।
Comment by Shyam Narain Verma on April 3, 2015 at 12:11pm
बेहद उम्दा ...बहुत बहुत बधाई आप को आदरणीय | सादर 
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 2, 2015 at 8:41pm
आभार भाई महर्षि त्रिपाठी जी आपका आपको ग़ज़ल पसंद आई लेखनी सार्थक हुई नमन आपको।
Comment by maharshi tripathi on April 2, 2015 at 8:34pm

अच्छी गजल पर ढेरो दाद आपको आ. सुनील प्रसाद(शाहाबादी जी |

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 2, 2015 at 8:01pm
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी सलाम कुबूल करें आपके अनमोल सुझाव और सराहना पाकर अभिभूत हूँ , बहुत आभार आपका।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 2, 2015 at 4:28pm

आदरणीय सुनील भाई , गज़ल बहुत अच्छी हुई है , दिली मुबारक बाद हाज़िर है । कुछ मिसरे आ.मिथिलेश भाई जी ने सुधार के लिये सुझाये हैं , गर आपको पसंद आये तो ऐसे कह के देखिये --

हमारे दर्द ने ढब ये सिखया है

बुरी हालत में भी हँसने हसाने का

मरा तू क्यों भला उसपे दिवाना दिल,
हिदायत दे गया जो छोड़ जाने का।

कहूँ क्या मै भला उल्फ़त से क्या पाया
बुरा अंजाम था  मेरे फ़साने का

आदरणीय , किसी के भाव तक पहुँच के सलाह देना कठिन काम है , फिर भी, अगर सही लगे तो स्वीकार कीजियेगा , अन्यथा और कुछ जो भी आपको सही लगे कह लीजियेगा ॥

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 2, 2015 at 3:16pm
बहुत आभार आपका मिथलेश वामनकर जी आपके सुझाव का स्वागत है आदरणीय कुछ अच्छा आप ही सुझा दें जिसपे गौर किया जा सके सादर नमन आपको।

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