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एक हिंदी ग़ज़ल/आ चली आ सितम

बह्र-212 212 212 212
बाअदब नजरे पेश
---------------------
चीज है क्या ज़रा देख लूँ बेरहम।
दर्द की है कसम आ चली आ सितम। (१)
****
नूर तो आँख का ले गये हो चुरा,
चाँदनी रात का दे रहे क्यों भरम। (२)
****
हो रही नग्न है नाचती ये ख़ुशी,
क्या नजर चाहती देखना ये हरम। (३)
****
देश को बेचतें आज भी लोग जो,
मोल दे दो उन्हें बेच देगें धरम। (४)
****
माँगते हम नहीं भीख तुमसे कभी,
राह चलते गिरें सम्हलें क्या शरम। (५)
****
लो सतालो हमें फिर रुलालो हमें,
वो लहू भी नहीं अब रहा,हो गरम। (६)
****
खेल ये मात शह का शिकारी सभी,
सत्य का सर झुका है उठा तो कलम। (७)

------------------------
मौलिक एवं अप्रकाशित
सुनील शाहाबादी।

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Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 9, 2015 at 8:31pm
आदरणीय महर्षि त्रिपाठी जी आपका बहुत बहुत आभार रचना को मान देने के लिये।
Comment by maharshi tripathi on April 9, 2015 at 6:19pm

बेहद उम्दा गजल हुई है,,,बहुत बहुत बधाई |

देश को बेचतें आज भी लोग जो,
मोल दे दो उन्हें बेच देगें धरम। ,,विशेष दाद |

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 8, 2015 at 10:25pm
आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्रा जी नमन और अशेष आभार ये मेरी ओ.बी.ओ. के पटल पर दूसरी ग़ज़ल है आसा है आप मेरे पेज पर जाकर पहली ग़ज़ल को भी देखेगें ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 8, 2015 at 6:23pm

आदरणीय सुनील जी पहली बार आपकी रचना पढने का मौका मिला ..आगाज शानदार हुआ ..आपकी इस रचना पर आपको हार्दिक बधाई सादर 

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 8, 2015 at 3:31pm
जनाब नजील साहब अदाब आपने ग़ज़ल पर गौर फरमाया इसके लिये प्यारा सा शुक्रिया है कबूल करें।
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 8, 2015 at 3:24pm
आदरणीय समीर काबीर जी इसे हिंदी ग़ज़ल के नजरिये से ही देखें क्योकि उर्दू तो कतई नहीं है ऊपर हमने लिखा भी है आपने इस गीतिका पर नजरे करम की आपको तहे दिल शुक्रिया जनाब आगे भी आपकी राय मशविरे का इन्तजार रहेगा आदाब ।
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 8, 2015 at 3:17pm
जनाब निर्मल नदीम जी आपका बहुत शुक्रिया हौसला अफजाई के लिए।
Comment by Nazeel on April 8, 2015 at 3:04pm

आदरणीय सुनील प्रसाद जी सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई । 

Comment by Samar kabeer on April 8, 2015 at 3:01pm
जनाब सुनील प्रसाद(शाहाबादी) जी,आदाब,हिंदी ग़ज़ल के नज़रिये से देखें तो आपकी कोशिश सराहनीय है,वैसे मेरा मत जनाब मिथिलेश जी और जनाब सौरभ पाँडे जी के साथ है |
Comment by Nirmal Nadeem on April 8, 2015 at 1:31pm
आदरणीय सुनील प्रसाद साहब। बहुत बहुत बधाई ग़ज़ल के लिए।।

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