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बहर= "रमल मुसम्मन महजूफ" 

2122 2122 2122 212

गर दिलों का दर्द उतरे शायेरी बन जाये ये
भूल ना चाहें अगर आवारगी बन जाये ये

मत समझना तुम मुहब्बत खेलने की चीज़ है
दिल्लगी करते हुये दिलकी लगी बन जाये ये

हम समझते ही रहें खुद को शनासा दोस्तों
मार कर हमको हमारी ज़िन्दगी बन जाये ये

दर्द ही मिलते रहें ऐसा नहीं होता अगर
चाह जिसकी वो मिले तो हर ख़ुशी बन जाये ये

तुम न करना इस क़दर बिस्मिल मुहब्बत टूटकर
सब हदों को तोड़ कर के बन्दगी बन जाये ये

 "मौलिक व अप्रकाशित"

    **( अय्यूब खान "बिस्मिल")**

यहीं से सीख कर पहली मर्तबा बहर में कहने की

कोशिश की है दोस्तों इस्लाह का मुन्तजिर हूँ 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 14, 2013 at 3:43pm

तुम न करना इस क़दर बिस्मिल मुहब्बत टूटकर 
सब हदों को तोड़ कर के बन्दगी बन जाये ये.............बहुत खूब !

सुन्दर गज़ल हुई है आ० अयूब खान जी 

हार्दिक बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 14, 2013 at 3:42pm

इस शुरुआत के लिए दिल से बधाइयाँ, बिस्मिल साहब.  आपने दिल रख लिया .. .

दाद कुबूल करें

शुभ-शुभ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on August 12, 2013 at 12:52pm

//गर दिलों का दर्द उतरे शायेरी बन जाये ये 
भूल ना चाहें अगर आवारगी बन जाये ये//

वाह बिस्मिल साहब आप वाकई बिस्मिल लगते हैं इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिये दिली दाद कुबूल फरमायें 

Comment by Ayub Khan "BismiL" on August 12, 2013 at 12:38pm

Venus Kesri sahab MamnooN Hu Aapki Mohabbat Ke Liye Jazbbat To Pehle Bhi Alfaaz Me Utaar Diya Karta Tha Magar Sahi Maayene Me Shayeri Apki Islaah Se He Sekhna Shuru Kiay Hai Maine ,, Is Lihaaz Se Aap Mere Gaybana Ustaad Huye ..................... Isi Mohabbat OR Islaah Ka Talib Rahunga Aapse ....SadaR

Comment by Ayub Khan "BismiL" on August 12, 2013 at 12:36pm

Janaab Viveek Mishr sahab , Giriraj sahab Neeraj sahab bahut bahut shukria is qadar honsla afzaai ke liye 

Comment by विवेक मिश्र on August 12, 2013 at 3:45am
इस आगाज़ का अंजाम.. उफ्फ.. ख़ुदा ख़ैर करे। दाद कबूल करें बिस्मिल जी।
Comment by वीनस केसरी on August 11, 2013 at 10:29pm

वाह बिस्मिल जी ...
क्या शानदार शुरुआत हुई है ... अब तो यही कहना पड़ना है खुद से कि ...

आगे आगे देखिए होता है क्या

ढेरों दाद क़ुबूल फरमाएँ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 11, 2013 at 9:33pm

वाह !! बिस्मिल भाई वाह !!

तुम न करना इस क़दर बिस्मिल मुहब्बत टूटकर
सब हदों को तोड़ कर के बन्दगी बन जाये ये

Comment by Neeraj Nishchal on August 11, 2013 at 7:00pm

हम समझते ही रहें खुद को शनासा दोस्तों
मार कर हमको हमारी ज़िन्दगी बन जाये ये |

तुम न करना इस क़दर बिस्मिल मुहब्बत टूटकर
सब हदों को तोड़ कर के बन्दगी बन जाये ये |

बिस्मिल साहब बहुत ही खूबसूरत और
खासकर ये शेर तो बहुत लाजवाब हैं ।

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