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खुद से बाहर निकल नही सकता
बर्फ हूँ पर पिघल नही सकता

मेरे अंदर दबा है ज्वालामुखी
आग लेकिन उगल नही सकता

तेरी आँखे बदल भी सकती हैं
मेरा चेहरा बदल नही सकता

मुझ को मिट्टी मे तुम मिला भी दो
तेरे साँचे मे ढल नही सकता

मुक्त आकाश का मैं पंछी हूँ
किसी पिंजरे मे पल नही सकता

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 8, 2010 at 4:35pm
Ek ek shayer anmol moti hai. Bahut hi aala mayaar ghazal hai Fauzan bhai - Jai Ho.
Comment by fauzan on May 27, 2010 at 8:39pm
Aap sabhi doston ka bahut 2 dhanyawad
Comment by विवेक मिश्र on May 25, 2010 at 12:33pm
nice thoughts... keep it up..
Comment by satish mapatpuri on May 24, 2010 at 4:46pm
तेरी आँखे बदल भी सकती हैं
मेरा चेहरा बदल नही सकता
मुक्त आकाश का मैं पंछी हूँ
किसी पिंजरे मे पल नही सकता फौज़ान भाई, बेहतरीन ग़ज़ल है, शुक्रिया.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 23, 2010 at 10:23am
खुद से बाहर निकल नही सकता
बर्फ हूँ पर पिघल नही सकता,

मुक्त आकाश का मैं पंछी हूँ
किसी पिंजरे मे पल नही सकता,

Behtarin ghazal kaha hai Fauzan bhai, aapka jabaab nahi hai, sabhi line bhawpurna hai, bahut badhiya, upar coat kiyey gayey share mujhey kafi achhey lagey shayad wo merey life ko touch kar raha hai,shukriya ees sasakt abhivyakti key liyey,
Comment by Biresh kumar on May 23, 2010 at 12:05am
मेरे अंदर दबा है ज्वालामुखी
आग लेकिन उगल नही सकता
aag laga di janab ne
bahut khub bhai!!!!!!!!!!
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on May 22, 2010 at 11:54pm
खुद से बाहर निकल नही सकता
बर्फ हूँ पर पिघल नही सकता

मेरे अंदर दबा है ज्वालामुखी
आग लेकिन उगल नही सकता
waah fauzan bhai waah.........bahut khub gazal likha hai aapne....
Comment by Kanchan Pandey on May 22, 2010 at 2:21pm
Bahut badhiya , Sir mai aapki har Gazhal padhti hu, aap bahut badhiya likhatey hai,

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 22, 2010 at 1:08pm
बहुत लाजवाब गजल है फौजान भाई ! बहर ज़रूर छोटी है मगर ख्याल बहुत ही बुलंद हैं ! लेकिन मकते से पहले वाले शे'अर का पहला मिसरा एक दफा फिर से आपकी नज़रेसानी मांगता है, झरना यहाँ आकर थोड़ी रवानी खो रहा महसूस होता है !
Comment by दुष्यंत सेवक on May 22, 2010 at 11:29am
कामयाबी ही रास आती है मुझको, किसी और चीज़ से मैं बहल नही सकता....
उम्दा, बेहतरीन, बेनज़ीर, शानदार, फ़ौज़ान भाईजान आपकी पंक्तियाँ तो सीधे अंतस में उतर जाती है......ये जो दो पंक्तियाँ है मुझे आपके लिए ध्यान आ गई तो मैने आपकी ग़ज़ल के काफ़िए में ही बढ़ने की ज़ुर्रत की है, आशा है आप अन्यथा नही लेंगे....

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