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आज़ादी --- डॉ o विजय शंकर

उड़ता वो आज़ाद परिंदा
नभ छू लेने की कोशिश
करता है,
ऊंचा , ऊंचा उड़ता है |
बीच बीच में धरती छूने ,
लौट , लौट कर आता है ,
कुछ चुंगता है, कुछ खाता है,
इठलाता है, कुछ गाता है ,
फिर , फुर्र से उड़ जाता है ,
दूर, बहुत दूर , ओझल हो ,
क्षितिज तरफ वो जाता है ,
क्षितिज तरफ वो जाता है ||
यूँ आते - जाते हमको वो
अपने हौसले दिखलाता है ,
और हमको यह बतलाता है,
हौसलों से क्या नहीं हो जाता है,
हौसलों से क्या नहीं हो जाता है ॥

एक परिंदा पिंजड़े में है ,
खाता है , पीता है ,
गाता है , सोता है ,
सबका मन बहलाता है,
फुर फुर्र भी वो करता है ,
बस उड़ नहीं वो पाता है ,
जोर बहुत वो लगाता है,
थक जाता है, सो जाता है,
फिर जागता है, खाता है ,
गाता है , फिर सो जाता है ,
वह हमको यह बतलाता है,
कुछ ऐसा भी है , बेशक है,
जो हो नहीं सकता है ,
कितना जोर लगा ले परिंदा
पिंजड़ा लेके नहीं उड़ सकता है।
यह ऐसा है जो हो नहीं सकता ,
पिंजड़े में बंद रहते हुए ,
वो कभी उड़ नहीं सकता है ॥
वो कभी उड़ नहीं सकता है ॥


मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर

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Comment by Pari M Shlok on February 19, 2015 at 12:12pm
परिंदे के माध्यम से जीवन के महत्वपूर्ण तथ्यों को उजागर करती सुन्दर कविता हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ विजय शंकर जी
Comment by khursheed khairadi on February 19, 2015 at 10:19am

एक परिंदा पिंजड़े में है ,
खाता है , पीता है ,
गाता है , सोता है ,
सबका मन बहलाता है,
फुर फुर्र भी वो करता है ,
बस उड़ नहीं वो पाता है ,

आदरणीय विजयशंकर सर ,क्या ख़ूब रचना हुई है |बंदी जीवन की विवशता का सटीक चित्रण किया गया है |सादर अभिनन्दन |

Comment by Hari Prakash Dubey on February 19, 2015 at 8:38am

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, सुन्दर दर्शन,जीवन के दो पक्षों को परिंदे के माध्यम से खूब चित्रित किया है आपने 

.//यूँ आते - जाते हमको वो
अपने हौसले दिखलाता है ,
और हमको यह बतलाता है,
हौसलों से क्या नहीं हो जाता है// ..सुन्दर रचना , हार्दिक बधाई ! सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 19, 2015 at 7:32am
आदरणीय मोहन सेठी जी, रचना की स्वीकृति के लिएआपका आभार। बधाई हेतु धन्यवाद , सादर।
Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on February 19, 2015 at 4:06am

बहुत खूब आज़ाद और गुलाम जिंदगी .....सुंदर रचना बधाई 

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 19, 2015 at 3:13am
प्रिय मिथिलेश जी , रचना की प्रशस्ति हेतु आभार एवं बधाई हेतु ह्रदय से बहुत बहुत धन्यवाद, सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on February 19, 2015 at 3:11am
आदरणीय समर कबीर जी , सादर नमस्कार रचना की प्रशस्ति हेतु आभार एवं बधाई हेतु ह्रदय से धन्यवाद, सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on February 19, 2015 at 3:01am
प्रिय जीतेन्द्र जी , रचना के मूल भाव की स्वीकृति हेतु आभार एवं बधाई हेतु ह्रदय से बहुत बहुत धन्यवाद, सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on February 19, 2015 at 2:59am
आदरणीय राजेश कुमारी जी , मूल भाव की स्वीकृति हेतु आभार एवं बधाई हेतु ह्रदय से धन्यवाद, सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on February 19, 2015 at 2:57am
आदरणीय सोमेश जी , भावों की स्वीकृति हेतु आभार एवं धन्यवाद, सादर।

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