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हम क्या कर रहे हैं -- डॉo विजय शंकर

देश बड़ा है , महान है ,
कहाँ है ,
हर एक तो अपने परिवेश
से परेशाँ है ,
सब अपनी अपनी पहचान
बता रहे हैं ,
दूसरे का अस्तित्व ही
नकार रहें हैं ,
स्वयं को खुद ढूंढ
नहीं पा रहे हैं ,
न अपने को समझा
पा रहे हैं ,
न दूसरे को समझा
पा रहे हैं ,
भटके हुए दूसरे को
रास्ता दिखा रहे हैं ,
कैसे कैसे टुकड़ों में
बँट रहे हैं ,
टुकड़ा टुकड़ा
लड़ा रहे हैं ,
कह रहे हैं हम
देश बना रहे हैं ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 485

Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on August 29, 2015 at 5:11am
आदरणीय सुशील सरना जी , कविता को वर्तमान और अतीत से जोड़ कर इतनी विस्तृत व्याख्या के लिए आपका ह्रदय से बहुत बहुत आभार , धन्यवाद , सादर।
Comment by Sushil Sarna on August 28, 2015 at 2:02pm

टुकड़ा टुकड़ा
लड़ा रहे हैं ,
कह रहे हैं हम
देश बना रहे हैं ॥
वाह आदरणीय  Dr. Vijai Shanker jee एक हकीकत को बयां करती इस सार्थक रचना के लिए हार्दिक बधाई। सर यही तो इनकी रोटी है … ब्रिटिश राज कहां गया है … आज भी वो कहीं न कहीं किसी मानसिकता में टुकड़ों के राज को ज़िंदा रखे हैं। न जाने कब कोई कुर्सी एक भारत की लिए जियेगी -एक भारत के लिए लड़ेगी ?

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 28, 2015 at 11:49am
प्रिय मिथिलेश जी , प्रयास है , करता हूँ। कहीं तो सार्थकता मिलेगी , वर्ना भ्रम भी अच्छे हैं , लोग तो हर हाल में खुश रहते हैं , वे भी खुश हैं जो समय के साथ हैं , वे भी , जो समय से बहुत पीछे हैं , बाँसुरी बजा रहे हैं , मस्त हैं। रचना पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 28, 2015 at 11:40am
आदरणीय महिर्षि त्रिपाठी जी , आपने रचना की बड़ी सही विवेचना की है , आभार , प्रशस्ति के लिए धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 28, 2015 at 11:37am
आदरणीय हर्ष महाजन जी , रचना को सम्मान देने के लिए आपका बहुत बहुत आभार। विवेचना हेतु धन्यवाद , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 28, 2015 at 1:45am

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, आपकी रचनाएँ गंभीर चिंतन का परिणाम हुआ करती है. इस प्रस्तुति पर आपको हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by maharshi tripathi on August 27, 2015 at 8:27pm

स्वयं को खुद ढूंढ
नहीं पा रहे हैं ,
न अपने को समझा
पा रहे हैं ,,,,,,,,,,,,बिलकुल सही है अगर इन दोनों में से एक भी गुण सभी मनुष्यों में हों तो देश के साथ -साथ,व्यक्तित्व भी सुधरेगा ,इस रचना हेतु आपको बधाई | 

Comment by Harash Mahajan on August 27, 2015 at 2:04pm

आदरणीय Dr. Vijai Shanker जी सही कहा आपने.....सभी अपने में मसरूफ हैं....महान सिर्फ कहने भर से नहीं कर्म करने से है....बहुत ही सार्थक कृति आदरणीय !! मेरी जानिब बधाई इस सुंदर पेशकश पर | सादर !!

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