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तकदीर
गर रोने सी ही
बदल सकती तकदीर
यह ज़मीन बस सैलाब होती
गर अश्क बहाने सी होती
हर गम की तदबीर
यह नम आंखें
कभी बेआब न होती

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Comment

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 7, 2010 at 8:28pm
Bahut hi kamaal ka khyal hai, Apke ashavaadi nazariye ko pranaam karta hun Rajni jee
Comment by Sanjay Kumar Singh on June 5, 2010 at 3:46pm
thoda kahana , bahut samajhna, yahi hai ees rachna ka mool tatwa , bahut badhiya,
Comment by Babita Gupta on June 5, 2010 at 1:07pm
pahley ki tarah achhi rachna hai, bahut badhiya,
Comment by Admin on June 4, 2010 at 3:39pm
वाह रजनी बहन वाह , इस छोटी सी कविता मे आपने बहुत कुछ कह डाला है, अच्छी रचना है,
Comment by satish mapatpuri on June 4, 2010 at 3:25pm
गर रोने सी ही
बदल सकती तकदीर
यह ज़मीन बस सैलाब होती
रजनी जी, बहुत खूब.
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on June 4, 2010 at 12:02pm
bahut hi badhiya rachna hai rajani didi..

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 4, 2010 at 10:29am
गर रोने सी ही
बदल सकती तकदीर
यह ज़मीन बस सैलाब होती.......

रजनी दीदी बहुत बढ़िया लिखा आपने , छोटी सी कविता मे बड़ी बात, बहुत खूब,
Comment by rajni chhabra on June 4, 2010 at 9:50am
thanx for this lovely comment,rana ji

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on June 4, 2010 at 9:41am
बहुत खूब कहा है रचना जी अपने बस इतना ही कहूँगा..........

मुझको आदत थी, जरा सी बात पर रोता रहूँ,
और वो तिजारत अश्क की दुनियां में बस करते रहे.

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