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नवगीत - शशि पुरवार

हस्ताक्षर की कही कहानी
चुपके से गलियारों ने
मिर्च मसाला , बनती ख़बरें
छपी सुबह अखबारों में.

राजमहल में बसी रौशनी
भारी भरकम खर्चा है
महँगाई ने बाँह मरोड़ी
झोपड़ियों की चर्चा है
रक्षक ही भक्षक बन बैठे है
खुले आम दरबारों में.

अपनेपन की नदियाँ सूखी,
सूखा खून शिराओं में
रूखे रूखे आखर झरते
कंकर फँसा निगाहों में
बनावटी है मीठी वाणी
उदासीनता व्यवहारों में.

किस पतंग की डोर कटी है
किसने पेंच लडाये है
दांव पेंच के बनते जाले
सभ्यता पर घिर आये है

आँखे गड़ी हुई खिड़की पर
होठ नये आकारों में.

मौलिक और अप्रकाशित

--शशि पुरवार

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Comment

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Comment by shashi purwar on August 13, 2014 at 1:23pm

आदरणीय कल्पना जी बहुत बहुत धन्यवाद ,

आदरणीय सौरभ जी  नवगीत पर आपकी समीक्षा से ही यूँ लगा लिखना  सार्थक हो  गया ,  देर से रिप्लाई के लिए माफ़ी चाहूंगी , समय ने अस्पताल पंहुचा दिया   था , उर्ज्वासित करती हुई प्रतिक्रिया हेतु आभार

आप सभी आदरणीय सुधिजनो की तहे दिल से आभारी  हूँ

Comment by कल्पना रामानी on July 22, 2014 at 8:54pm

बहुत सुंदर नवगीत रचा है शशि जी, आप यूँ ही तरक्की करती रहें। हार्दिक बधाई आपको


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 21, 2014 at 2:54am

नवगीत के बिम्बात्मक प्रतिमानों के सापेक्ष एक निहायत पठनीय रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया शशिजी.

यह अवश्य है कि १६-१४ पर मात्राओं का निर्वहन इन दो आधार पंक्तियों में नहीं हो पाया है -

रक्षक ही भक्षक बन बैठे है
खुले आम दरबारों में.

बनावटी है मीठी वाणी
उदासीनता व्यवहारों में.

किन्तु, आपकी प्रस्तुति के इंगित अभिनव हैं, इसमें कोई संदेह नहीं. और, यही किसी नवगीत के लिए प्रमुख मानकों में से एक है.
प्रस्तुति के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ.

Comment by JAGDISH PRASAD JEND PANKAJ on July 20, 2014 at 1:04pm

अच्छी रचना है। एक सुझाव है दूसरे बंद की अंतिम पंक्ति में लय कुछ बाधित लग रही है। 'उदासीनता' की जगह यदि 'उदासीन'ही रखा जाय तो शायद ठीक रहेगा। अच्छे नवगीत के लिए शशि पुरवार को बधाई । 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 14, 2014 at 8:18pm

बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ रची है आपने आदरणीया शशि जी

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 13, 2014 at 9:47am

अपनेपन की नदियाँ सूखी,
सूखा खून शिराओं में
रूखे रूखे आखर झरते
कंकर फँसा निगाहों में
बनावटी है मीठी वाणी
उदासीनता व्यवहारों में................अति सुंदर भाव उभर कर आयें है, आपको बहुत बहुत बधाई आदरणीया शशि जी

Comment by Santlal Karun on July 12, 2014 at 8:23pm

आदरणीया शशि पुरवार जी,

वर्तमान जन-जीवन की हताशा पर व्यंग्य करता यह नवगीत आम आदमी के दुखते मर्म को स्पर्श करता है---

"राजमहल में बसी रौशनी 
भारी भरकम खर्चा है
महँगाई ने बाँह मरोड़ी 
झोपड़ियों की चर्चा है 
रक्षक ही भक्षक बन बैठे है
खुले आम दरबारों में."

... हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

Comment by shashi purwar on July 11, 2014 at 1:42pm

आदरणीय शिज्जू शकूर जी  प्रोत्साहित करती हुई टिप्णी हेतु बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by shashi purwar on July 11, 2014 at 1:41pm

आदरणीय राजेश कुमारी जी उर्ज्वासित करती हुई प्रतिक्रिया हतु तहे दिल  आभार .

Comment by shashi purwar on July 11, 2014 at 1:40pm

आदरणीय डा. गोपाल नायारण जी , प्रोत्साहित करती हुई टिप्णी हेतु तहे दिल से आभार

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