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फसल [ कविता अतुकांत ]

मेरी बेटी ने गमले में

लॉलिपॉप बो दिया हैI

खुद को पूरा भिगो कर

पानी भी देती है

मिठास की लहलहाती फसल का

इंतज़ार कर रही है I

पगली ने उस दिन

कागज़ का तिरंगा भी बो दिया था

कि  ढेर सारे तिरंगे 

ढेर सारा देश प्रेम उगेगा I

बच्चों की बातें  हैं 

ऐसी ही बेतुकी  ,नासमझ I

हम तो बड़े हैं ,समझदार हैं

हम थोड़ी करते हैं विश्वास 

इन बातों पर ,हैं ना ?

मौलिक व् अप्रकाशित 

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Comment by pratibha pande on November 24, 2015 at 10:50pm

रचना पर उत्साहवर्धन करने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी  


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 23, 2015 at 6:59pm

अत्यंत सान्द्र प्रस्तुति केलिए हार्दिक बधाइयाँ, आदरणीय प्रतिभाजी. सही कहूँ तो बहुत दिनों बाद मंच पर इतनी गहन रचना आयी है और मैं उससे गुजर रहा हूँ. लाक्षणिकता का इतना सार्थक प्रयोग हुआ है कि यह रचना एकदम से चकित करती हुई हृदय में बस जाती है.  आपकी अभिव्यक्तियों से हम एक-एक कर गुजर रहे हैं, मानों ये हमें अपने में गहरे उतरने की आवाज़ लगा रही हों. 

आप प्रयासरत रहें, आदरणीया प्रतिभाजी. आपका सतत प्रयास आपकी अभिव्यक्तियों की सहजता और स्पष्टता का कारण बनता जायेगा.  

अलबत्ता, बेतुकि   को बेतुकी कर लें 

हार्दिक शुभकामनाएँ  

Comment by pratibha pande on November 23, 2015 at 4:36pm

आदरणीय मिथिलेश जी ,सराहना के लिए हार्दिक आभार आपका , 'बेतुकि? क्या ये शब्द सही नहीं ?

Comment by pratibha pande on November 23, 2015 at 4:33pm

आदरणीय श्याम नारायण जी ,उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार 

Comment by pratibha pande on November 23, 2015 at 4:32pm

आदरणीय सतविंदर जी रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 23, 2015 at 3:35pm

शानदार कविता. कथ्य का मर्म जिस सघनता से शाब्दिक हुआ है, बस दिमाग झन्ना गया है. बहुत बधाई इस प्रस्तुति पर आपको आदरणीया प्रतिभा जी. 

'बेतुकि?'

Comment by Shyam Narain Verma on November 20, 2015 at 3:40pm
बहुत ही सूंदर प्रस्तुति , हार्दिक बधाई आपको ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 19, 2015 at 8:16pm
बहुत भावपूर्ण एवम् सुंदर रचना ।हार्दिक बधाई आदरणीय प्रतिभा जी

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