चली आयी है मिलने फिर किधर से
१२२२ १२२२ १२२
जो बच्चे दूर हैं माँ –बाप – घर से
वो पत्ते गिर चुके समझो, शज़र से
शिखर पर जो मिला तनहा मिला है
मरासिम हो अहम, तो बच शिखर से
रसोई में मिला वो स्वाद आख़िर
गुमा था जो किचन में उम्र भर से
तू बाहर बन सँवर के आये जितना
मैं भीतर झाँक सकता हूँ , नज़र से
छिपी है ज़िंदगी में मौत हरदम
वो छू लेगी अगर भागेगा डर से
खुशी बेनाम है, ज़िद्दी है, बस वो
चली आयी है मिलने फिर किधर से
लिये कश्कोल अब वो घूमता है
गदा खाली न भेजा जिसने दर से
तू चाहे चल, घिसट या दौड़ता रह
नहीं मुमकिन अलग होना सफ़र से
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औलिक एवं अप्रकाशित
Comment
आदरणीय गिरिराज भाईजी, आपकी प्रस्तुति का यह लिहाज इसलिए पसंद नहीं आया कि यह रचना आपकी प्रिया विधा में है, बल्कि इसके कई अश’आर कई स्तरों पर अर्थवान होते हैं.
जो बच्चे दूर हैं माँ –बाप – घर से
वो पत्ते गिर चुके समझो, शज़र से .. ... स्थानीय दूरी और सांस्कारिक दूरी के बीच का जो भावांतर है वह इस मतले को वाकई बड़ा करता है.
शिखर पर जो मिला तनहा मिला है
मरासिम हो अहम, तो बच शिखर से ... क्या बात है, आदरणीय ! मुझे अटलजी की एक प्रसिद्ध कविता का स्मरण हो आया -
मेरे प्रभु ! मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना / गैरों को गले न लगा सकूँ, / इतनी रुखाई कभी मत देना..
रसोई में मिला वो स्वाद आख़िर
गुमा था जो किचन में उम्र भर से ... इस शेर ने मुझे भावमय कर दिया. रसोई और किचन का भेद/ अंतर किस महीनी से निखरा है.
तू बाहर बन सँवर के आये जितना
मैं भीतर झाँक सकता हूँ , नज़र से ... भाईजी, झाँका तो नजर से ही जाता है. फिर इस नजर की आवश्यकता क्यों बनी ? ’नजर’ के स्थान पर यदि ’असर’ का प्रयोग कर देखिए, क्या बात बनती दीख पड़ती है?
छिपी है ज़िंदगी में मौत हरदम
वो छू लेगी अगर भागेगा डर से ... हम्म्म.. हमारे यहाँ एक मसल है, जिसका लुब्बेलुबाब है, कि मौत से नहीं उसके ’परक जाने’ से डर लगता है.
खुशी बेनाम है, ज़िद्दी है, बस वो
चली आयी है मिलने फिर किधर से .. यह शेर मेरे पास बहुत नहीं खुल सका. हालाँकि, इसका भावार्थ समझ रहा हूँ. कि, खुशी से उम्मीद तो न थी कि वो मिलने को चली आये या उत्सुक हो.
लिये कश्कोल अब वो घूमता है
गदा खाली न भेजा जिसने दर से .. समय-समय की बात है. और, श्रेय और प्रेय की भावनाएँ भी किये गये कार्य की गरिमा और उपलब्धियों को प्रभावित करती है. ’कर्त्ता होने’ का तीक्ष्ण भाव कार्य-परिणाम को कमतर कर ही देता है. कहा भी गया है न, बोये पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय ? कर्त्ता होने के उत्कट भाव से ऐसी ही दुर्गतियों से पाला पड़ता है.
तू चाहे चल, घिसट या दौड़ता रह
नहीं मुमकिन अलग होना सफ़र से ... वाह वाह ! एक जिंदा आदमी जिंदगी के सफर से व्गि हो ही नहीं सकता. जिंदगी एक सफर है. अब इसे निबाहना ही पुरुषार्थ है. यही प्रारब्ध को साधता है.
आपकी प्रस्तुति की हमने भाव-यात्रा की. अच्छा लगा. हार्दिक बधाइयाँ
आदरणीय चेतन प्रकाश भाई ग़ज़ल पर उपस्थित हो उत्साह वर्धन करने के लिए आपका हार्दिक आभार
आदरणीय आपकी सलाह उचित है , सलाह के अनुसार सुधार अवश्य कर लूंगा , आपका पुनः आभार
आदरणीय सुशील भाई गज़ल की सराहना कर उत्साह वर्धन करने के लिए आपका आभार
आदरणीय लक्ष्मण भाई , उत्साह वर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार
खूबसूरत ग़ज़ल हुई आदरणीय गिरिराज भंडारी जी ।
"छिपी है ज़िन्दगी मैं मौत हरदम
वो छू लेगी अगर ( जो तू ) भागेगा डर के
सुझाया हुआ विकल्प कदाचित बेहतर होता
क्योंकि पूरा शे'र बिना कर्ता रह जाएगा !
सादर!
आ. भाई गिरिराज जी, सादर अभिवादन। बहुत खूबसूरत गजल हुई है। हार्दिक बधाई।
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