आदरणीय काव्य-रसिको !
सादर अभिवादन !!
’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ छिहत्तरवाँ आयोजन है।
.
छंद का नाम - चौपाई छंद
आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ -
21 फरवरी’ 26 दिन शनिवार से
22 फरवरी’ 26 दिन रविवार तक
केवल मौलिक एवं अप्रकाशित रचनाएँ ही स्वीकार की जाएँगीं.
चौपाई छंद के मूलभूत नियमों के लिए यहाँ क्लिक करें
जैसा कि विदित है, कई-एक छंद के विधानों की मूलभूत जानकारियाँ इसी पटल के भारतीय छन्द विधान समूह में मिल सकती हैं.
***************************
आयोजन सम्बन्धी नोट :
फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो आयोजन हेतु निर्धारित तिथियाँ -
21 फरवरी’ 26 दिन शनिवार से 22 फरवरी’ 26 दिन रविवार तक रचनाएँ तथा टिप्पणियाँ प्रस्तुत की जा सकती हैं।
अति आवश्यक सूचना :
छंदोत्सव के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है ...
"ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" के सम्बन्ध मे पूछताछ
"ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" के पिछ्ले अंकों को यहाँ पढ़ें ...
विशेष : यदि आप अभी तक www.openbooksonline.com परिवार से नहीं जुड़ सके है तो यहाँ क्लिक कर प्रथम बार sign up कर लें.
मंच संचालक
सौरभ पाण्डेय
(सदस्य प्रबंधन समूह)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम
Tags:
आ. भाई अखिलेश जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति, स्नेह और मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।
आपकी आपत्तियों के अनुसार सुधार किया है मार्गदर्शन करने की कृपा करें -
*भरता इससे पेट कमाके। इसके बिन हो जाते फाके।।
*आज जगा है भाग्य सवेरे। लाया जो गोरी को डेरे।।
*चप्पल उसकी सिली न जाती। नंगे पाँव न वो चल पाती।।
*ग्राहक में भगवान बसा है, सेवा ने व्यापार कसा है।
चप्पल उसकी सिली न जाती। बिन चप्पल के वह रह जाती।।....वाह ! वाह ! प्रदत्त चित्र की आत्मा का भाव आपने उतार दिया है इस पंक्ति में किन्तु तुकांतता के दोष रह गया है. प्रदत्त चित्र पर अन्य चौपाइयाँ बहुत सुन्दर रची हैं आपने आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी. हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर
आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।
तुकांतता के दोष में इस प्रकार सुधार किया है देखीएगा -
*
चप्पल उसकी सिली न जाती। नंगे पाँव न वो चल पाती।
चौपाई छंद ( संशोधित)
+++++++++++++++
स्थान एक तीरथ लगता है। जमघट संतों का रहता है॥
कितनी सुंदर है ये नारी। फिसल ना जाए ब्रह्मचारी॥
सौम्य विदेशी मोहक लगती। परी लोक की मूरत दिखती॥
सौंदर्य रसिक कवि भी कहता। दिखे सादगी में सुंदरता॥
करे मरम्मत जूते चप्पल। काम नित्य का यही आजकल॥
कटे फटे सब को सीता है। सदा अभावों में जीता है॥
काम नकद का नहीं उधारी। कारण यही काम है जारी॥
बहस नहीं करते नर नारी। धंधे में रखता ना यारी॥
आस नहीं मैं करता जिनसे। इज्जत ज्यादा मिलती उनसे॥
जब भी यहाँ विदेशी आते। बिन मांगे ज्यादा दे जाते॥
बंद दुकान बना है डेरा। बाकी समय लगाता फेरा॥
जब दुकान के मालिक आते। डेरा डंडा सब उठ जाते॥
गुमटी शासन से मिल जाए। जीवन में खुशियाँ भर आए॥
काम चलेगा बारह मासी। ना अभाव न होगी उदासी॥
+++++++++++++++++++++
मौलिक अप्रकाशित
आ. भाई अखिलेश जी, यह संशोधित छंद और भी उत्तम हुए हैं। यह पूर्ण रूप से चित्र को संतुलित कर रहे हैं। बहुत बहुत हार्दिक बधाई।
हार्दिक धन्यवाद लक्ष्मण भाई
आवश्यक सूचना:-
1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे
2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |
3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |
4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)
5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |
© 2026 Created by Admin.
Powered by
महत्वपूर्ण लिंक्स :- ग़ज़ल की कक्षा ग़ज़ल की बातें ग़ज़ल से सम्बंधित शब्द और उनके अर्थ रदीफ़ काफ़िया बहर परिचय और मात्रा गणना बहर के भेद व तकतीअ
ओपन बुक्स ऑनलाइन डाट कॉम साहित्यकारों व पाठकों का एक साझा मंच है, इस मंच पर प्रकाशित सभी लेख, रचनाएँ और विचार उनकी निजी सम्पत्ति हैं जिससे सहमत होना ओबीओ प्रबन्धन के लिये आवश्यक नहीं है | लेखक या प्रबन्धन की अनुमति के बिना ओबीओ पर प्रकाशित सामग्रियों का किसी भी रूप में प्रयोग करना वर्जित है |