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दर्द कुछ और नहीं --डा० विजय शंकर

पूछा किसी ने मुझसे
दर्द क्या है ,
कैसा है ये , इसका
एहसास कैसा है .

दर्द कुछ और नहीं
सिर्फ एक नाम तुम्हारा है
दर्द कुछ और नहीं
सिर्फ एहसास तुम्हारा है .

दर्द टूटने का नहीं है,
दर्द बिखर जाने का है
दर्द कुछ खोने का नहीं है ,
खुद के खो जाने का है .

दर्द उसे खोनेका नहीं
जो अपना था, खो गया .
बल्कि उसके खोने का है ,
जो अपना कभी था ही नहीं .

यूँ तो कुछ था नहीं
जो वो ले गया
एक उम्मीद थी
वो भी ले गया .

दर्द का एहसास
शायद मीठा ही होता .
गर दर्द का कुछ रिश्ता
आंसुओं से न होता .

जिंदगी है तो दर्द है
दर्द है तो जिंदगी है
जिंदगी नहीं तो दर्द नहीं
दर्द नहीं तो जिंदगी नहीं .

तुम थे साथ तो था
कोई दर्द नहीं
तुम्हारे बाद तुमसा
कोई दर्द नहीं .

तुम्हारे बाद तुमसा
कोई दर्द नहीं....

मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर

Views: 472

Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on August 8, 2014 at 10:03am
प्रस्तुति पर आपके विचारों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय डॉ o आशुतोष मिश्रा जी .
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 7, 2014 at 6:22pm

जिंदगी है तो दर्द है
दर्द है तो जिंदगी है
जिंदगी नहीं तो दर्द नहीं
दर्द नहीं तो जिंदगी नहीं ./..आदरणीय विजय जी ..दर्शन से ओतप्रोत इस सुंदर रचना के लिए तहे दिल बधाई 

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 5, 2014 at 11:00pm
आदरणीय गोपाल नरायन जी आपको कविता पसंद आई , अच्छा लगा . बधाई के लिए धन्यवाद .
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 5, 2014 at 8:12pm

सुन्दर i  अति सुन्दर i

तुम थे साथ तो था
कोई दर्द नहीं
तुम्हारे बाद तुमसा
कोई दर्द नहीं .

 

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 5, 2014 at 2:36pm
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी, बहुत बहुत धन्यवाद , दर्शन की बात करके आपने इसका मोल बढ़ा दिया .
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 5, 2014 at 2:33pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, बहुत बहुत धन्यवाद ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 5, 2014 at 11:23am

आदरणीय विजय भाई , कुछ जीवन दर्शन समेटे आपकी रचना के लिये आपको बधाइयाँ ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 5, 2014 at 11:09am

अति उत्तम हार्दिक बधाई स्वीकारें आ० भाई विजय शंकर जी .

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 5, 2014 at 12:50am
आपको बहुत बहुत धन्यवाद , प्रिय जीतेन्द्र जी .
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 4, 2014 at 11:23pm

बहुत ही सुंदर, मन को छू गई आपकी रचना. बहुत-२ बधाई आपको आदरणीय डा. विजय जी

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