आदरणीय लघुकथा प्रेमिओ,
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अच्छी लघुकथा है आ० मनन कुमार सिंह जी बधाई स्वीकार करेंI दूसरी किस्त की अदायगी के ज़िक्र से बात काफी हद तक साफ तो हो रही है लेकिन एकदम से "हिट" नहीं कर रहीI भाई उस्मानी जी ने जो इशारा दिया है वह बहुत हद तक सही हैI क्योंकि किसी भ्रष्ट आदमी का यूँ अपराधबोध से दब जाना स्वाभाविक नहीं लग रहा हैI हाँ, इस निम्नलिखित पंक्ति में यदि थोडा फेर-बदल कर लिया जाए तो शायद बात बने:
//-नहीं सर,अभी नहीं रूकूँगी।पति साथ में हैं'//
इसको यदि यूँ कर लिया जाए, तो कैसा रहेगा?
//नहीं सर, आज नहीं रुक सकती, पति साथ में हैंI पिछली बार जब अकेली आई थी तो बहुत मारा था उसने मुझेI//
अच्छी कथा के लिए बधाई प्रेषित है आपको आदरणीय मनन कुमार जी
जनाब मनन कुमार साहिब , प्रदत्त विषय को परिभाषित करती सुंदर लघु कथा के लिए मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं
साहब के पास दरोगा जी और अर्दली की भूमिका समझ नहीं आई आदरणीय ।
कथा के चित्रण हेतु बधाई ।
बढ़िया लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय मनन जी, सादर!
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