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आदरणीय साहित्य प्रेमियो,

जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर नव-हस्ताक्षरों, के लिए अपनी कलम की धार को और भी तीक्ष्ण करने का अवसर प्रदान करता है. इसी क्रम में प्रस्तुत है :

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-180

विषय : "वो भी क्या दिन थे"

आयोजन 15 नवंबर 2025, दिन शनिवार से 16 नवंबर 2025, दिन रविवार की समाप्ति तक अर्थात कुल दो दिन.
ध्यान रहे : बात बेशक छोटी हो लेकिन 'घाव करे गंभीर’ करने वाली हो तो पद्य- समारोह का आनन्द बहुगुणा हो जाए. आयोजन के लिए दिये विषय को केन्द्रित करते हुए आप सभी अपनी मौलिक एवं अप्रकाशित रचना पद्य-साहित्य की किसी भी विधा में स्वयं द्वारा लाइव पोस्ट कर सकते हैं. साथ ही अन्य साथियों की रचना पर लाइव टिप्पणी भी कर सकते हैं.

उदाहरण स्वरुप पद्य-साहित्य की कुछ विधाओं का नाम सूचीबद्ध किये जा रहे हैं --

तुकांत कविता, अतुकांत आधुनिक कविता, हास्य कविता, गीत-नवगीत, ग़ज़ल, नज़्म, हाइकू, सॉनेट, व्यंग्य काव्य, मुक्तक, शास्त्रीय-छंद जैसे दोहा, चौपाई, कुंडलिया, कवित्त, सवैया, हरिगीतिका आदि.

अति आवश्यक सूचना :-

रचनाओं की संख्या पर कोई बन्धन नहीं है. किन्तु, एक से अधिक रचनाएँ प्रस्तुत करनी हों तो पद्य-साहित्य की अलग अलग विधाओं अथवा अलग अलग छंदों में रचनाएँ प्रस्तुत हों.
रचना केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, अन्य सदस्य की रचना किसी और सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी.
रचनाकारों से निवेदन है कि अपनी रचना अच्छी तरह से देवनागरी के फॉण्ट में टाइप कर लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें.
रचना पोस्ट करते समय कोई भूमिका न लिखें, सीधे अपनी रचना पोस्ट करें, अंत में अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल आदि भी न लगाएं.
प्रविष्टि के अंत में मंच के नियमानुसार केवल "मौलिक व अप्रकाशित" लिखें.
नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति को बिना कोई कारण बताये तथा बिना कोई पूर्व सूचना दिए हटाया जा सकता है. यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
सदस्यगण बार-बार संशोधन हेतु अनुरोध न करें, बल्कि उनकी रचनाओं पर प्राप्त सुझावों को भली-भाँति अध्ययन कर संकलन आने के बाद संशोधन हेतु अनुरोध करें. सदस्यगण ध्यान रखें कि रचनाओं में किन्हीं दोषों या गलतियों पर सुझावों के अनुसार संशोधन कराने को किसी सुविधा की तरह लें, न कि किसी अधिकार की तरह.

आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है. लेकिन बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पायें इसके प्रति टिप्पणीकारों से सकारात्मकता तथा संवेदनशीलता अपेक्षित है.

इस तथ्य पर ध्यान रहे कि स्माइली आदि का असंयमित अथवा अव्यावहारिक प्रयोग तथा बिना अर्थ के पोस्ट आयोजन के स्तर को हल्का करते हैं.

रचनाओं पर टिप्पणियाँ यथासंभव देवनागरी फाण्ट में ही करें. अनावश्यक रूप से स्माइली अथवा रोमन फाण्ट का उपयोग न करें. रोमन फाण्ट में टिप्पणियाँ करना, एक ऐसा रास्ता है जो अन्य कोई उपाय न रहने पर ही अपनाया जाय.

फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो 15 नवंबर 2025, दिन शनिवार लगते ही खोल दिया जायेगा।

यदि आप किसी कारणवश अभी तक ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार से नहीं जुड़ सके है तो www.openbooksonline.com पर जाकर प्रथम बार sign up कर लें.

महा-उत्सव के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है ...
"OBO लाइव महा उत्सव" के सम्बन्ध मे पूछताछ

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" के पिछ्ले अंकों को पढ़ने हेतु यहाँ क्लिक करें

मंच संचालक

मिथिलेश वामनकर
(सदस्य टीम प्रबंधन)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम परिवार

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Replies to This Discussion

स्वागतम

वो भी क्या दिन थे सखा, रह रह आए याद।

करते थे सब काम हम, ओबीओ के बाद।।

रे भैया ओबीओ के बाद।

वो भी क्या दिन थे सखी, रचना कर तैयार।

आयोजन खुलना तके, हम सब बारम्बार।

सखी री हम सब बारम्बार।

वो भी क्या दिन थे सखा, रचना आते एक।

उस पर आती प्रतिक्रिया, पल में होती अनेक।

रे भैया पल में होती अनेक।

वो भी क्या दिन थे सखी, कविता का मकरंद।

कुछ पल अपने साथ में, ले आते थे छंद।

सखी री ले आते थे छंद।

वो भी क्या दिन थे सखा, आयोजन गुलज़ार।

रचना से ज्यादा यहां, होते रचनाकार।

रे भैया होते रचनाकार।

(मौलिक व अप्रकाशित)

आ. भाई मिथिलेश जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर आपने सर्वोत्तम रचना लिख कर मेरी आकांक्षा पूर्ण  कर दी है। इसके लिए असीम हार्दिक बधाई और आभार।

ओबीओ पर पसरे सन्नाटे को देख मन कलपता है। कई बार इस सम्बंध में लिखने की सोची पर लिख नहीं पाया। आज आपने उस पीड़ा को शब्द दे दिए । अब देखना है कि यह पीड़ा कितनों तक पहुँच पाती है। आपका पुनः आभार।

हार्दिक आभार आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।

माता - पिता की छाँव में चिन्ता से दूर थे
शैतानियों को गाँव में हम ही तो शूर थे।।
*
लेकिन सजग थे पीर न हमसे किसी को हो
अपना था गाँव, गाँव की आँखों के नूर थे।।
*
केवल हँसी थी और वो अद्भुत था बचपना।
जो भी  दिवस  थे  पास  में मस्ती में चूर थे।।
*
पनघट से खेत, खेत से चौपाल हर कहीं
हम ही गुलाब  गाँव  के  हम ही मसूर थे।।
*
वो भी क्या दिन थे आँच में तपते तो थे मगर
हीरा   न   थे,   माता   के   सोना  जरूर  थे।।
*
मौलिक /अप्रकाशित

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी प्रदत्त विषय अनुरूप बहुत बढ़िया प्रस्तुति हुई है। इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर

वो भी क्या दिन थे...

आँख मिचौली भवन भरे, पढ़ते   खाते    साथ ।

चुराते टिफिन  हम निशा, शक होता शिवनाथ ।।

खिला  समोसे  पीड़िता, खत्म पाप का  नाम ।

क्षमा  माँगते  एक  दिन, फिर वही करें काम ।।

कारनामे  और  बहुत, गिनवायें  क्या  काम ।

नाराज  गर प्राचार्य  से,  हंगामा    अंजाम ।।

नयी रोज गप हांकते, दें  लड़की  को   नाम ।

चश्मे वाली दार्शनिक, किताब  घिस्सू जाम।।

वो भी क्या दिन थे .....!

मौलिक व अप्रकाशित 

आदरणीय चेतन प्रकाश जी प्रदत्त विषय अनुरूप बहुत बढ़िया प्रस्तुति हुई है। इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर

वो भी क्या दिन थे, 

ओ यारा,

ओ भी क्या दिन थे।

ख़बर भोर की घड़ियों से भी पहले मुर्गा देता।

बाड़े की हलचल कहती कोई हमरी सुध लेता।

आहट करता एक सयाना, पूरा ही घर जागे।

मां- बाबा चाचा- चाची सब बिस्तर छोड़े भागे।

मुन्नी बबुआ धीरे-धीरे उठते थे अलसाते।

मगर चाय की खुशबू से सब एक जगह जुड़ जाते।

बासी रोटी, चाय कलेवा सब मिलकर करते थे।

थोड़ी बातें, थोड़ी चुप्पी 'हूं हां' से डरते थे।

अपने अपने काम पकड़ने सारे दौड़ लगाते।

और टाट की एक नहानी मिलकर व्यस्त बनाते।

इधर लिपाई की खातिर से चाची गोबर घोले।

पानी लाने गगरी ले लो, मां फूफी से बोले।

छोटी चाची भी लग जाती थी चूल्हे चौके से।

दादी, बाड़ी साग लिवाने चल देती मौके से।

बाबा चाचा सभी निकलते फिर खेतों में तपने।

मुन्नी बबुआ भी बस्तों में भर लेते थे सपने।

विद्यालय को झाड़ पोंछ कर खुद ही टाट बिछाते।

गुरुजी के तगड़े हाथों में खुद ही बेंत थमाते।

पांचों कक्षाएं लग जाती केवल दो कक्षों से।

सब डरकर बैठे रहते थे गुरुजी के अक्षों से।

कुछ चतुराई करते अपना चेला-धर्म निभाते।

चार बेंत के बदले गुरुजी को सब्जी दे आते।

घंटी की टन टन सुनकर ही सबको राहत मिलती।

दौड़ लगाते हर चेहरे पर बस मुस्काने खिलती।

सूरज सरक-सरक ले आता गोधूली बेला।

धीरे-धीरे से घर में फिर से लग जाता मेला।

माचिस बिन भी आग, पड़ोसी काकी से मिल जाती।

संझा बत्ती से चूल्हे तक वो ही घर चमकाती।

चूल्हे की हांडी से खुशबू फिर घर में भर जाती।

रोटी की मीनारें पंगत में तब आती जाती।

बच्चे मिलकर तीन चार लोटों में पानी भरते।

चाचा बाबा मुन्नी बबुआ थाली साझा करते।

दौर कहानी का चलता सबके सोने से पहले।

खूब कथानक में होते हर इक नहले पे दहले।

कान कथा में लगे हुए और आँखें गगन निहारे।

जाने कब आंखें लग जाती लाखों देख सितारे।

वो भी क्या दिन थे,

ओ यारा,

वो भी क्या दिन थे।

(मौलिक और अप्रकाशित)

आ. भाई मिथिलेश जी, सादर अभिवादन।प्रदत्त विषय पर सुन्दर प्रस्तुति हुई है। हार्दिक बधाई।

हार्दिक आभार आदरणीय 

बीते तो फिर बीत कर,
पल छिन हुए अतीत
जो है अपने बीच का,
वह जायेगा बीत

जीवन की गति बावरी,
अकसर दिखी न लोच
सो बीते को भूल कर,
सुधि आगे की सोच

तब के दिन भी खूब थे,
थी मन में बस प्रीत
सब के प्रति समभाव था,
निश्छल थे मनमीत

कली-कली-से दिन सुखद,
फूल-फूल-सी रात
तुम थे हम थे और थी,
बगिया-बगिया बात

यौवन में उत्साह था,
अब है झंझावात
यही समय का ढंग है,
यही समय की बात

***

मौलिक और अप्रकाशित 

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