For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

प्रयाग-क्षेत्र में ओबीओ के तत्त्वावधान में काव्य-गोष्ठी का आयोजन

आज की तारीख में नेट पर समाज के हर क्षेत्र में ऐसा बहुत कुछ सकारात्मक हो रहा है जो अधिक नहीं मात्र दसेक वर्ष पूर्व इस तरह की गतिविधियों के बारे में सोचा तक नहीं जा रहा था. साहित्य-सृजन के क्षेत्र में जो गति इधर के समय में आयी है वह स्थापित और नव-हस्ताक्षरों दोनों को एकसाथ अभिभूत करती है. भले ही अधिकांश रचनाओं का मौज़ूदा स्तर बहस का मुद्दा है, लेकिन इस बात से कोई गुरेज़ नहीं कि इसी दौर में ऐसी-ऐसी इलेक्ट्रॉनिक पत्रिकाएँ और ऐसे-ऐसे ब्लॉग्स हैं जहाँ स्तरीय साहित्य पर विशेषकर हिन्दी साहित्य में बहुत गंभीर काम हो रहे हैं जहाँ रचनाकर्म और भाव-शब्द सृजन का अन्यतम वातावरण बन और व्याप रहा है. 

 

इलेक्ट्रॉनिक पत्रिका ओपेन बुक्स ऑनलाइन (ओबीओ) ने अपने प्रकाशन के आरम्भ से ही अपने सदस्यों और रचना-कर्मियों के लिये जिस सीखने-सिखाने का माहौल बनाया है वह हिन्दी के साहित्यांगन में सकारात्मक चर्चा का विषय बन चुका है. मात्र कुछ महीनों में ही ओबीओ के मंच पर चल रहे इस विन्दुवत् प्रयास के सफल परिणाम आने लगे हैं. 


एक बात जो एक अरसे से महसूस की जा रही थी, वह यह कि, आभासी दुनिया के रचनाकारों का भौतिक सम्मिलन भी होना चाहिये. ओबीओ के कई प्रबुद्ध सदस्यों के साथ-साथ ओबीओ प्रबन्धन का भी मानना रहा है कि शहर-दर-शहर छोटी-छोटी साहित्यिक-गोष्ठियों का समयबद्ध आयोजन उक्त शहर में साहित्यिक गतिविधियों में आशातीत त्वरण का कारण हो सकता है. साथ ही साथ, आपसी भावनात्मक सम्बन्धों के प्रगाढ़ होने मे ऐसे सम्मिलनों और सम्मेलनों की महती भूमिका हुआ करती है. इस सबका सकारात्मक प्रभाव रचनाकारों के साहित्यिक-कर्म पर खूब पड़ता है. कहना न होगा, इस तरह के आयोजनों की प्रबल संभावनाओं के बावज़ूद, उनके प्रारम्भ होने में आसन्न कठिनाइयाँ अधिक हावी हो रही थीं. इसी दौरान वाराणसी में सम्पन्न पिछले महीने की साहित्यिक-गोष्ठी का आयोजन सभी के लिये सकारात्मक उत्प्रेरण का कारण बन गयी. 


वाराणसी में हुए उन्हीं प्रयासों के मद्देनज़र देश की साहित्यिक राजधानी प्रयाग (इलाहाबाद) में भी एक साहित्यिक-गोष्ठी का होना तय हुआ. इसी दौरान, ओबीओ के प्रबन्धन समिति के सदस्य श्री राणा प्रतापजी तथा सदस्य श्री विवेक मिश्रजी ’ताहिर’ का प्रयाग आगमन इस हकीकी सम्मिलन का खूबसूरत कारण बन गया.

मुझ खाक़सार के सादर अनुरोध पर ऊर्जस्वी वीनस केसरी के सुप्रयासों से ओबीओ के कई सदस्य और नेट की दुनिया से जुड़े साहित्यकार जोकि आभासी दुनिया में मेरे साथ-साथ कइयों के लिये महज़ सक्रिय नाम भर थे, ने वास्तविकता के धरातल पर आ कर भौतिक रूप से एक जगह मिलने का विचार किया. 


दिनांक 26 नवम्बर 2011 का अपराह्न कई मायनों में ओबीओ के लिये ऐतिहासिक घड़ियाँ ले कर आया. वीनस केसरीजी, जो कि आभासी तथा वास्तविक दुनिया कई हस्ताक्षरों के सीधे सम्पर्क में हैं, ने शहर के कतिपय साहित्यप्रेमियों को इस शहर के ऐतिहासिक चन्द्रशेखर आज़ाद पार्क (कम्पनी बाग) के प्रांगण में काव्य-गोष्ठी होने की सूचना दे दी. किसी आयोजन के पूर्व मानव सुलभ चिंता और उसके ’सफल होने या न होने’ की मनोदशा और दुविधाओं से घिरे होने के बावज़ूद वीनसजी काव्य-गोष्ठी के आयोजन के प्रति जी जान से जुट गये. आज परिणाम सामने है -- साहित्यिक-गोष्ठियों के लिये पिछली पीढ़ियों में सुप्रसिद्ध प्रयाग शहर इन गोष्ठियों की आवश्यकता तक भूल चुका था, मानों जैसे जागृत हो गया. 

राणाप्रतापजी, जयकृष्णजी ’तुषार’, श्रीमती लता आर. ओझा, विवेकजी, इम्तियाज़ अहमदजी ’ग़ाज़ी’, वीनसजी और मुझ ख़ाकसार के नामों  की सूची लिये पार्क की मनमोहती हरीतिमा की पृष्ठभूमि में अशोक के एक विशाल छायादार वृक्ष की छाँव में वीनसजी के संचालन में गोष्ठी आरम्भ हुई. गोष्ठी की सदारत का जिम्मा मुझ ख़ाकसार पर डाल दिया गया.  

विवेकजी से काव्य-पाठ का श्रीगणेश हुआ. आपकी ’मैं कौन हूँ’ रचना ने प्राकृतिक रहस्यों के अबूझपन के मध्य मानवीय संज्ञा को खँगालने का प्रयास किया. आपकी दूसरी रचना में गुरबत की ज़िन्दग़ी जी रहे लोगों का शब्द-चित्र बखूबी उतर आया था - 


एक कमरे का है ये मकाँ 
यहाँ आदमियों को जगह नहीं
खाने को दो दिनों की भूख
पीने को रिस-रिस कर बहता पानी. 

ओबीओ की गंभीर सदस्या तथा नेट के कई ब्लॉग्स पर अपनी गरिमामय उपस्थिति जता चुकी लताजी अपनी छंदमुक्त रचनाओं से गोष्ठी की वाह-वाहियाँ बटोर ले गयीं. आपके नवगीत की निम्नलिखित पंक्तियों ने सभी रचनाकारों और श्रोताओं का ध्यान खूब आकृष्ट किया -  


शब्द चुप से हैं, कुछ अरसे से

मन है व्याकुल सा 
भाव हैं तरसे-से
घुमड़ते हुए बादल बरसते ही नहीं 
जाने क्या देखते हैं नयन सूने से.. .

ओबीओ की प्रबन्धन समिति के मनोनित सदस्य श्री राणा प्रतापजी, जोकि विविध कार्यालयी कारणों से मात्र ओबीओ ही नहीं, नेट पर हो रही अन्य साहित्यिक गतिविधियों से भी कुछ अरसे विलग से थे, अपनी शानदार ग़ज़ल, नवगीत और मुक्तक से सभी का मन मोह लिया. आपकी ग़ज़लों की तासीर से परिचित यह जानते हैं कि आपके शे’र अनगढ़ व्यवस्था तथा मानवीय भाव-विडंबनाओं की एक साथ खबर लेते हैं. आपकी ग़ज़ल के प्रस्तुत अश’आर ने श्रोताओं से खूब वाह-वाहियाँ बटोरीं -   

भूख की चौखट पे आकर कुछ निवाले रह गये
फिर से अँधियारे की ज़द में कुछ उजाले रह गये.
 
आपकी ताक़त का अंदाज़ा इसी से हो गया 
इस दफ़े भी आप तो कुर्सी संभाले रह गये 
 
जम गये आँसू, चुका आक्रोश, सिसकी दब गयी
इस पुराने घर में बस चुप्पी के जाले रह गये 

निम्नलिखित बंद की पंक्तियों का माध्यम लेकर राणाजी ने अपने संवेदनापूरित हृदय से सबको भिगो कर रख दिया. राष्ट्र-प्रेम का जज़्बा योंही अंगड़ाइयाँ नहीं लेता -  
 
देश पे मिटने के ख्वाबों से 
जब कोई तल्लीन लगे 
जब मीठा गुड़ नमकीन लगे 
और मीठी, कड़वी नीम लगे 
जब अपने मुल्क की सरहद पर 
उठने कोई संगीन लगे 
वतनपरस्ती का दिल में जब कोई जज़्बा होता है
तब कहीं देश के कोने में 
एक सैनिक पैदा होता है... ..

राणाजी ने संचालक महोदय को ज़हमतेसुख़्न देने के पूर्व ओबीओ और नेट पर अपनी साहित्यिक गतिविधियों और संलग्नता को पुनः जारी रखने का शुभ-आश्वासन दिया.  इस घोषणा का सभी उपस्थित लोगों ने जम कर स्वागत किया. 

वीनसजी से मिल कर और उनको सुन कर हिन्दी की वो कहावत आदमकद हो उठती है जिसमें किसी नायाब के पेट में ही दाढ़ी होना कहा जाता है. वीनसजी ने ग़ज़ल के क्षेत्र में अपने गंभीर प्रयासों से नेकनामी कमायी है. ग़ज़ल कहने के सिलसिले में आप द्वारा बारीकियाँ बरतना अच्छे-अच्छों को चौंका जाता है. आप सामाजिक विडंबनाओं, अवरुद्ध व्यवस्था, अनुत्तरदायी राजनीति और संवेदनहीन राजनीतिबाजों के विरुद्ध हमेशा-से मुखर रहे हैं जोकि आपका प्रिय विषय भी है. आपके कुछ अश’आर की बानग़ी - 

सोचता है जो, कब, कहाँ, कैसे 
पाये मंज़िल का निशाँ कैसे?

आज हैरत में हैं सियासतदाँ 
बेज़ुबाँ पा गये ज़ुबाँ कैसे !?

या फिर, 
ये उसकी तिश्नग़ी है या तिज़ारत 
वो मुझ जैसे को दरिया बोलता है 

मेरी माँ आजकल खुश है इसी में 
अदब वालों में बेटा बोलता है 

वीनसजी के बाद जयकृष्ण ’तुषार’ को न्यौता मिला. आप इलाहाबाद हाई कोर्ट से सम्बन्धित होने के साथ-साथ अपना ब्लॉग चलाते हैं जहाँ गये दौर के लब्धप्रतिष्ठित रचनाकारों की रचनाएँ उन्हीं की हस्तलिपि में उपलब्ध होती हैं. इस ज़ुनून ने आपको कई पुराने साहित्यकारों की उन्हीं के हाथों लिखी रचनाओं का संग्रहकर्ता बना दिया है. आप रचना की हर विधा में दखल रखते हैं. आपकी ग़ज़ल से जहाँ ज़मीन की पारंपरिक खुश्बू आती है वहीं नवगीतों में रचा-बसा सोंधापन मुग्ध कर देता है - 

हमें चाँदनी चौक, मुम्बई और 
न ही भोपाल चाहिये 
हम किसान-बुनकर के वंशज 
हमको रोटी-दाल चाहिये.. .

इन पंक्तियों का रचनाकार इसी रौ में आगे टेर उठता है, और श्रोतागण वाह-वाह करते नहीं अघाते - 

आप धन्य !
जनता के सेवक 
रोज बनाते महल-अटारी
भेष बदल कर भाव बदल कर 
हमको छलते बारी-बारी 
परजा के हिस्से महँगाई 
राजा को टकसाल चाहिये .. .

इम्तियाज़ अहमद ’ग़ाज़ी’ साहब के संरक्षण में इस प्रयाग की सरज़मीं पिछले नौ सालों से ’गुफ़त्ग़ू’ जैसी पत्रिका का सफल प्रकाशन देख रही है. आपके बारे प्रसिद्ध है कि आप अपनी ग़ज़ल अक्सर अपनी पत्रिका में नहीं देते. नये हस्ताक्षरों को मंच देने का ज़ुनून यह कि मंचों पर अपनी रचनाओं और ग़ज़लों से गुरेज़ करते हैं.  ग़ाज़ी साहब ने छोटी बह्र की अपनी दो खूबसूरत ग़ज़लें कहीं. आपको सुनना मेरे लिये तो एक सुखद अनुभव था ही, उनको जानने वालों के लिये आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता थी. 

जिसका दुश्मन नहीं है कोई 
उससे बच के रहा कीजिये..

ग़र सलीका नहीं इश्क़ का 
बस ग़ज़ल पढ़ लिया कीजिये !!

ग़ाज़ी साहब को सुन लेने के बाद संचालक वीनसजी ने ख़ाकसार से गोष्ठी की शम्अ प्रतिष्ठित करने की उम्मीद ज़ाहिर की. ग़ज़ल की पटरी पर पैयाँ-पैयाँ चलने का प्रयास करता मैं श्रोताओं के सामने गाँव पर कुछ शब्द-चित्र, कुछ दोहे और एक ग़ज़ल लिये प्रस्तुत हुआ. श्रोताओं की उन्मुक्त बधाइयों ने मेरा हौसला बढ़ाया जिसके लिये मैं सभी के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ. 

चंपा चढ़ी मुँडेर पर, गद्-गद् हुआ कनेर 
झरते हरसिंगार बिन, बचपन हुआ कुबेर

मन की बंद किताब पर, मौसम धरता धूल
पन्ने-पन्ने याद हैं, तुम अक्षर, तुम फूल

फटी बिवाई देख कर, चिंतित दीखी राह
मौसम-मौसम धूल में, पत्थर तोड़े ’आह’ 

ग़ज़ल के प्रयास पर सुधि श्रोताओं से मिली गर्मजोशी भरी दाद मेरे आत्मबल के बढ़ने कितना बड़ा कारण बनी है, यह मैं बस महसूस कर सकता हूँ. बानग़ी के तौर पर कुछ अश’आर उद्धृत कर रहा हूँ -

शाख पे उल्लुओं को जो देखा 
रौशनी झेंपती फिरे हर सू 

रात भर चाँद साथ सोता है 
वो मग़र ढूँढता उसे हर सू

बात परवाज़ की कहो क्यों हो
परकटे बाज़ रह गये हर सू  

गोष्ठी के सफल समापन के बाद संचालक वीनसजी के उदार सौजन्य से चार तरह की जायकेदार मठरियों, नरम-नरम ढोकलों, सोंधी-सोंधी नानखटाइयों और कुरकुराते बिस्किटों का जो दौर चला कि सभी रचनाकार और श्रोतागण अश-अश कर उठे. इसी बीच राणाजी दौड़ कर गला तर करने का इंतज़ाम कर आये. नीम ठण्ढे में ठण्ढा पीना आनंददायक रहा. अल्पाहार का जो दौर चला कि नम-नम कुनकुनाती ठण्ढ से लगातार गुलाबी हुए जा रहे हमसभी मनस और पेट की खुराक से संतृप्त होते चले गये. 

इतने शार्ट नोटिस पर आयोजित हुई  और पूरे तीन घण्टे चली इस गोष्ठी को हर तरह से सफल बनाया परस्पर श्रद्धा और आदर ने. सफल बनाया साहित्यानुराग तथा ओबीओ के स्वीकारू वातावरण ने, जो कि अब वस्तुतः भौतिक रूप से सर चढ़ा दीख रहा है. 

मैं हार्दिक रूप से धन्यवाद देता हूँ गोष्ठी में आये विशुद्ध श्रोताओं को जिनकी उपस्थिति ने हमें उत्साहित किये रखा. सभी रचनाकारों की गरिमामय उपस्थिति के लिये मैं ओबीओ प्रबन्धन की ओर से सादर बधाइयाँ देता हूँ. तथा, हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ भाई वीनसजी को जिनका सहयोग ओबीओ के पटल को तो मिलता ही है, भौतिक आयोजन के प्रति उनकी संलग्नता भी हमारे लिये संतोष और सफलता का कारण बन गयी. 

***********************
-- सौरभ
-----

 

 

Views: 761

Reply to This

Replies to This Discussion

गणेश, तब तो बड़ी अच्छी बात है.

मेरी जिंदगी का इतना बड़ा हिस्सा यहाँ गुजर गया किन्तु काव्य-गोष्ठी के बारे में बहुत उत्सुकता रहती थी. लेकिन मैं जिंदगी के झमेलों में इस तरह उलझी कि अपनी रुचियों को ही भूल गयी. और अब उम्र के इस मुकाम पर पहुँची तो कुछ कोशिशों से पता लगा कि यहाँ भी काव्य-गोष्ठी होती हैं. अब तक दो में ही जा सकी हूँ. एक में तो भारत से आने वाले तमाम कवियों का 'विराट सम्मलेन' हुआ था यू के के १२ शहरों में...लंदन में वो मंडली ४ सितम्बर को आई थी. और दूसरा काव्य-सम्मलेन अभी करीब एक महीने पहले लंदन में दिवाली के कुछ दिन पहले हुआ जहाँ भी मेरा जाना हुआ था. फोटो एल्बम है फेसबुक पर...देखना उसमें. 

जिंदगी में तमाम लोगों के सामने पहली बार अपनी एक रचना पढ़ने का मौका मिला था मुझे भी. ...इसलिये मैं बड़ी नर्वस थी. यहाँ एक पत्रिका भी निकलती है हिंदी की. जिसके बारे में पहले पता नहीं था. 

 

तब तो इनमें से कुछ से संपर्क करें और बस एक गोष्ठी सम्पन्न हुई समझिये.

 

//आनंद के बारे में इलाहाबाद में शिरकत किये हुए सदस्य ज्यादा प्रकाश डाल सकते है//

सत्य वचन. आनन्द की लहरें अभी भी हलोरें ले रही हैं. अभिभूत हैं सभी.

 

 

mere liye to ye ek avismarneey anubhav rahaa..jinko sadaa padhti aayi thi unko saakchhat milna aur sunna bahut sukhad rahaa.. Aur jaisa ki tay hua hai,agli goshthi ka intezaar rahega.:) Aur is aayojan ke liye sabhi ko badhai aur aabhaar :)

जी लता जी, आपने सही कहा है.

हम सभी आपस में एक दूसरे को पढ़ चुके थे, परन्तु आपस में मिलने का अविस्मरणीय संयोग नहीं बन पाया था.

सधन्यवाद

 

Bahot khushi hui is goshthi ke baare men jankar, agar Kanpur men hotito main sammilit hone men khshi mehsoos karti

शुभकामनाओं के लिये आपका धन्यवाद मोहतरमा मुमताज़जी.

आप कानपुर शहर में अपने तईं इस तरह की गोष्ठी के आयोजित होने का माहौल बना सकती हैं.

 

 

सौरभ जी, तुषार जी, राणा जी, लता जी, इम्तियाज़ जी और विवेक जी आप सभी का विशेष रूप से आभारी हूँ
आप कार्यक्रम में आयें और सभी ने मिल कर इसे "सफल कार्यक्रम" में परिवर्तित कर दिया 

सफल इस मायनों में भी कि हममे से अधिकतर लोग एक दूसरे से पहली बार मिले और भौतिक रूप से उपस्थिति की एक सुन्दर शुरुआत हुई

और इस मायने में भी कि सभी को एक दूसरे से मिला कर आपार हर्ष हुआ
और कहीं न कही इस मायने में भी कि , मैं कई महीने से सभी लोग को आपस में मिलवाना चाहता था जो इलाहाबाद में हैं नेट की दुनिया में अच्छा कर रहे हैं और साहित्य से जुड़े हुए हैं

कार्यक्रम की रूपरेखा इतनी त्वरित बनी थी कि कई लोग कार्यक्रम में नहीं पहुँच सके क्योकि या तो इलाहाबाद में नहीं थे या अन्य कार्यक्रम में व्यस्त थे तो कोशिश रहेगी कि अगली बार वो सभी आ सकें जो इस बार नहीं आ सके 

 

सादर
वीनस केशरी

हर कार्य का नियत समय होता है, वीनसजी.  गोष्ठी के आयोजन का समय आया तो हर कुछ संयत होता चला गया. 

कविवर अयोध्या प्रसाद सिंह ’हरिऔंध’ जी की कर्मवीरों को इंगित करती पंक्तियाँ हैं न..

देख कर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं

रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं

 

//कार्यक्रम की रूपरेखा इतनी त्वरित बनी थी कि कई लोग कार्यक्रम में नहीं पहुँच सके//

इस क्रम में फोन पर आप द्वारा श्रीमती अलकाजी से सम्बन्धित घटना का वर्णन करना मुझे दिल से दुखी कर गया है, जिसे मैं आपके माध्यम से सभी के साथ साझा करना चाहता हूँ. 

अलकाजी उक्त आयोजन की परिधि तक आ गयी थीं किन्तु मोबाइल के घर पर ही छूट जाने के कारण हमसे सम्पर्क कर नियत स्थान तक नहीं आ पायीं. और करीब एक घण्टे तक भटकने के बाद वापस हो गयीं. वीनसजी, मुझे बहुत ही अफ़सोस हुआ है. जिस शारीरिक अवस्था और दौर में उनका होना ज्ञात हुआ है,  उनके साथ इस तरह का कुछ होना हमसभी के लिये अत्यंत ही दुख की बात है.  हम सब की भावनाओं से आप उन्हें अवश्य ही सूचित कर देंगे.

 

शानदार आयोजन और जानदार काव्य रचनाएँ !! वाह बधाई सभी को !!! क्या अच्छा होता हम सभी श्रोता के रूप में वहां होते !! बहरहाल इस रपट ने इस कमी को पूरा किया साधुवाद !!

भाई अभिनवजी,  जिस तत्परता और आसानी से आपने वाराणसी की गोष्ठी को अंजाम दिया उसी का विस्तार प्रयाग क्षेत्र तक हुआ है.  देखिये अगली गोष्ठी वाराणसी में कब होती है.  और आप तो वैसे श्रोता हैं जो बखूबी अपनी रचना सुनाता है और खुल कर दाद भी पाता है.

 

इस सफल आयोजन के लिए सभी को बधाई|

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

vijay nikore commented on vijay nikore's blog post डूब गया कल सूरज
"रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, प्रिय भाई समर कबीर जी।"
29 minutes ago
vijay nikore commented on amita tiwari's blog post जायदाद के हकदार
"सचाई से भरपूर सुन्दर मार्मिक रचना के लिए धन्यवाद, मित्र अमिता जी ।"
43 minutes ago
Anupama Mishra is now a member of Open Books Online
47 minutes ago
TEJ VEER SINGH commented on TEJ VEER SINGH's blog post प्रेम पत्र - लघुकथा -
"हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब जी। आदाब।"
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Samar kabeer's blog post एक ताज़ा ग़ज़ल
"आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । बेहतरीन गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post नए बीज / कविता
"आ. भाई चंद्रेश जी, अच्छी कविता हुई है । हार्दिक बधाई । "
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on MUKESH SRIVASTAVA's blog post प्रेम गली अति सांकरी
"आ. भाई मुकेश जी, सुंदर कथा हुई है । हार्दिक बधाई ।"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post ग़ज़ल मनोज अहसास
"आ. भाई मनोज जी, अच्छी गजल हुई है , हार्दिक बधाई । 'बेटी जब कालेज में पढ़ने' कर लीजिएगा…"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on amita tiwari's blog post ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द
"आ. अमिता जी, सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post रखकर जो नाम राम का -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post रखकर जो नाम राम का -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि भसीन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार।"
2 hours ago
Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post ग़ज़ल मनोज अहसास
"हार्दिक आभार प्रिय मित्र शाहिद जी सादर"
3 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service