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प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'
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प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s Page

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Samar kabeer commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post बेइंतहा  जिन्हें   हम,    दिन    रात    चाहते   हैं (ग़ज़ल)
"छटे शैर 'अज़' शब्द का इस्तेमाल वहाँ किया जाता है जहाँ इज़ाफ़त ज़ेर के रूप में नहीं लग सकती । 'कल पहले अज़ अजल ही कर डाला क़त्ल-ए-दुख़्तर' इस मिस्रेको यूँ कर सकते हैं :- 'कल मौत से ही पहले कर डाला क़त्ल-ए-दुख़्तर'"
Mar 3
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post बेइंतहा  जिन्हें   हम,    दिन    रात    चाहते   हैं (ग़ज़ल)
"सुंदर गजल..."
Mar 3
प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post होली के दोह - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"वाह आ० लक्ष्मण धामी जी, होली के दोहे पढ़कर तो मज़ा आ गया, सभी बातों को समेटा हुआ है, आपने अपने दोहों में.. और शुरूआत तो शानदार हैं, कि "मन करता है साल में, फागुन हों दो चार""
Mar 2
प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post मरीज़-ए-इश्क़ की दवा हकीम कर  सका  नहीं (ग़ज़ल)
"शुक्रिया ज़नाब सुरेंद्र  ज़नाब लक्ष्मण धामी साहिब। "
Mar 2
प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post बेइंतहा  जिन्हें   हम,    दिन    रात    चाहते   हैं (ग़ज़ल)
"ग़ज़ल में शिरकत के लिये शुक्रिया जनाब नरेंद्र साहिब एवं जनाब राम अवध साहिब। "
Mar 2
प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post बेइंतहा  जिन्हें   हम,    दिन    रात    चाहते   हैं (ग़ज़ल)
"बेहद शुक्रिया जनाब हर्ष महाजन साहिब। "
Mar 2
प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post बेइंतहा  जिन्हें   हम,    दिन    रात    चाहते   हैं (ग़ज़ल)
"ज़नाब समर साहिब! ग़ज़ल में शिरकत के लिए शुक्रिया।हवासिल, हौसला का बहुवचन है।आरात का अर्थ निकट या पास होता है।इंसाँ से ही अर्थ लिया गया है।अब्ना का अर्थ बेटों मतलब पुत्रों से लिया गया है।उला में जो व्याकरणिक दोष है उस पर भी एक बार नज़रे…"
Mar 2
Samar kabeer commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post बेइंतहा  जिन्हें   हम,    दिन    रात    चाहते   हैं (ग़ज़ल)
"जनाब 'दीप' साहिब आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें । तीसरे शैर में 'हवासिल' का क्या अर्थ लिया है? 4थे शैर में 'आरात' का अर्थ बताएं? 5वैं शैर में 'इनशा' क्या 'इंसां' है? 6ठे शैर के…"
Mar 1
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post मरीज़-ए-इश्क़ की दवा हकीम कर  सका  नहीं (ग़ज़ल)
"सुंदर गजल हुई है, हार्दिक बधाई ।"
Feb 27
Ram Awadh VIshwakarma commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post बेइंतहा  जिन्हें   हम,    दिन    रात    चाहते   हैं (ग़ज़ल)
"आदर्णीय प्रदीपकुमार पाण्डे जी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कहने के लिये बधाई। "
Feb 27
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post मरीज़-ए-इश्क़ की दवा हकीम कर  सका  नहीं (ग़ज़ल)
"आद0 प्रदीप कुमार पांडेय जी सादर अभिवादन। बहुत बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल। शैर दर शैर मुबारकवाद कुबूल फरमाएं। सादर"
Feb 27
narendrasinh chauhan commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post बेइंतहा  जिन्हें   हम,    दिन    रात    चाहते   हैं (ग़ज़ल)
"लाजवाब "
Feb 27
Harash Mahajan commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post बेइंतहा  जिन्हें   हम,    दिन    रात    चाहते   हैं (ग़ज़ल)
"एक बेहतरीन पेशकश आदरणीय प्रदीप जी। दाद कबूल कीजियेगा ।"
Feb 27
प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' posted blog posts
Feb 27
प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post ग़ज़ल: जो भी बनकर हबीब आता है
"ज़नाब विजय साहिब और ज़नाब बृजेश साहिब ! ग़ज़ल पसंद करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया। "
Feb 26
प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post ग़ज़ल: जो भी बनकर हबीब आता है
"ज़नाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब ! तहे दिल से शुक्रिया। "
Feb 26

Profile Information

Gender
Male
City State
भुज, गुजरात
Native Place
सिमरिया,

प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s Blog

बेइंतहा  जिन्हें   हम,    दिन    रात    चाहते   हैं (ग़ज़ल)

मफ़ऊल फ़ाइलातुन मफ़ऊल फ़ाइलातुन 

वो    प्यार    का    हमारे,    इस्बात    चाहते    हैं।

बेइंतहा  जिन्हें   हम,    दिन    रात    चाहते   हैं।।

होकर     खड़े      हुए    हैं,    बेदार    सरहदों    पर,

जो    अम्न-ओ-चैन   वाले,   हालात   चाहते   हैं।।…

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Posted on February 26, 2018 at 11:00pm — 9 Comments

मरीज़-ए-इश्क़ की दवा हकीम कर  सका  नहीं (ग़ज़ल)

मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन

बिसात-ए-गैर क्या है जब, नदीम कर सका नहीं।

मरीज़-ए-इश्क़ की दवा हकीम कर  सका  नहीं।।

अदीब से हुए  नहीं  कुछ  एक  काम  आज  तक,

असीर कर  गया  जिसे  फ़हीम  कर सका नहीं।।

लिखीं  पढ़ीं   भले  कई,  कहानियाँ  ज़हान   की,

मगर क़सूर क्या रहा  अज़ीम कर  सका  नहीं।।

मिलान चश्म, चश्म और, क़ल्ब, क़ल्ब का हुआ,

कमाल जो हुआ कभी कलीम …

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Posted on February 25, 2018 at 11:11pm — 7 Comments

जब  उठी उनकी नज़र (चार कवाफ़ी के साथ ग़ज़ल)

अरकान: फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन  

जब  उठी  उनकी   नज़र,  इफ़रात   घर  जलने  लगे।

ख़ुद नहीं हमको  ख़बर, किस  बात  पर  मरने  लगे।।



आपकी   काबिल   मुहब्बत,   सीख   हमको   दे  गई,

राह  में   आईं   अगर,   आफा़त   हर   सहने   लगे।।



यह ज़मीं ज़न्नत नज़र आएगी इक दिन खुद-ब-खुद,

बाप-माँ  की  हर  बशर  ख़िदमात  गर  करने  लगे।।



मिल गई इक  बार  अब  नुसरत  उसे  फिर  से  वहाँ,

आजकल  वो  ज़र  जिधर  ख़ैरात  कर  चलने…

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Posted on February 22, 2018 at 11:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल: जो भी बनकर हबीब आता है

*[बहर-ए-खफ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून]*



*2122 1212 22*



बन के मेरा हबीब आता है।

जो भी दिल के करीब आता है।।



सबकी तकदीर में लिखा है सब,

कौन बनने गरीब आता है।।



खून मेरा उबलने है लगता,

रू-ब-रू जब रकीब आता है।।



कद्र भाई की है नहीं जिसको,

वही लेकर ज़रीब आता है।।



आजकल हो गया उसे है क्या,

बन के हरदम अजीब आता है।।



हौसले देखकर हमारे अब

पढ़ने खुतबा ख़तीब आता है।।



'दीप' अब ऐतबार है किसका

काम… Continue

Posted on January 30, 2018 at 2:48pm — 11 Comments

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